STORYMIRROR

Vinod Kumar Mishra

Others

3  

Vinod Kumar Mishra

Others

अंधा बन दौड़ रहा है

अंधा बन दौड़ रहा है

1 min
299

उद्देश्यहीन नर यूँ दौड़ रहा है

मानो आकाश को चूम रहा है

जब नहीं पता है मंजिल उसको

फिर क्योंं अंधा बन दौड़ रहा है।


सामर्थ्य का अपने ज्ञान नहीं है

पथ का भी कुछ आभास नहीं है

नहीं ज्ञान है निज लक्ष्य का उसको

फिर क्यों अंधा बन दौड़ रहा है।


चलती ट्रेन के संग दौड़ लगाता

सेल्फी अपनी वह खींच रहा है

काल के गाल में खो जाता है

फिर क्यों अंधा बन दौड़ रहा है।


क्षणिक प्रशंसा पाने की खातिर

जीवन अनमोल से खेल रहा है

सर्वश्रेष्ठ जगती का प्राणी वह

फिर क्यों अंधा बन दौड़ रहा है।



Rate this content
Log in