आँसू और मन
आँसू और मन
1 min
379
वह समय सुहावन सा था
इतना सब उनमें घटा था
कुछ हलकी सी स्मृतियों में
वह अजीब से भी पल थे
उन यादों की छाया में
जिसमें मन तिरता जाए
फिर फिर कर इधर उधर यह
कभी सिहरे कभी घबराये
छलनी हो होकर फिर से
क्यों आखिर दुःख को पीता
इन पिछली पहेलियों से
अपना ही चैन तो छिनता
कितने ऐसे मोड़ पर
चाहता नहीं जाना है ये
बीते हुई दुःख को भर
फिर से कंपकपाता है
कुछ ऐसी ही बुनती है
आड़ी तिरछी होकर के
भीतर तक धंस बनती है
यादों के साये में चुपके
हर होंठ की सिहरन जाने
आँखों की झपक भी बूझे
एक बाढ़ लिए हर दिल का
आँसुओं से मन जब उलझे
