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मर्फी रेडियो
मर्फी रेडियो
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© Saumya Jyotsna

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रेडियो का जमाना भी एक अलग ही जमाना हुआ करता था। घर के सभी लोगों का चहेता। उसकी घूमती नाव में सारा संसार समाहित होता था, हर सूचना या आपातकाल की घोषणा सब रेडियो पर ही मिलती थी, लोग रेडियो से चिपके रहते थे।

कभी-कभी तो रेडियो को लेकर लड़ाईयाँ भी होती थीं, जैसे आज रिमोट के लिए होती हैं। दादी को सुबह का भजन सुनना है, तो दादा को न्यूज़, किसी को नए-पुराने फ़िल्मी गानों का चस्का है, तो किसी को अपने धारावाहिक की चिंता है । क्योंकि उस वक़्त न तो रिवाइंड के आप्शन होते थे और न ही रिकॉर्ड के। शाम को चाय पर चर्चा भी रेडियो के साथ ही होती थी। भारत-पाकिस्तान का मैच हो, तो दृश्य अलग ही रूप लिए होता था, उस वक़्त भी लोग चौकों-छक्कों पर उछल पड़ते थे और अपने चहेते खिलाड़ी के आउट होने पर मायूस भी। कुछ बच्चे तो यह तक बता देते थे कि बल्ला किस ओर घुमाकर शॉट लगाया गया है, उसके बाद ठहाकों की बरसात और पुनः शांति। भई! आगे का मैच भी तो सुनना है, कई महिलाओं को बड़ी शिकायत होती थी। कैसा डब्बा है? दिनभर पटर-पटर करता रहता है, कभी चुप हीं नहीं होता। लोग रेडियो पर अपनी फरमाइशे भेजते थे, अपने मनपसंद गानों के लिए, जैसे रामपुर के इटावा से महल फिल्म के गाने, जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा की फरमाइश आई है। फरमाइश कि है दिलीप ने अपने प्रिय के लिए, अब जब अपनी प्रिय का न नाम बताया और न पता, कितने दिलीप होंगे और उनकी प्रिय। ऐसे में सब अपने-अपने कयास लगाकर मन ही मन मुस्कुराकर सुना करते थे।

उस वक़्त की बात ही निराली थी, कम संसाधन थे,पर लोगों के पास एक-दूसरे के लिए वक़्त की कमी नहीं होती थी। पर आज जब संसाधन बढ़ गये हैं,तब लोगों के पास वक़्त की कमी है, हर कोई अपने काम में व्यस्त है। साथ बैठकर ख़ुशियाँ मनाना, एक-दूसरे के साथ वक़्त बिताना अब शायद पुरानी बात हो गई है।

कुछ दिनों पहले ही साफ-सफाई करते वक़्त, मुझे पुराना मर्फी रेडियो मिला, जिसके बाद मैंने ये लेख लिखा और अभी रेडियो पर गाना आ रहा है ‘सजन रेडियो ऽऽऽऽऽऽऽ बजइयो बजइयो बजइयो जरा...

गाने डब्बा वक़्त

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