अदालत में आखिरी दिन
अदालत में आखिरी दिन
अदालत और आखिरी दिन ये दोनों ही शब्द किसी के मन को आंदोलित करने के लिए काफी होते हैं । लेकिन बात इतनी भी गंभीर नहीं है । यह एक संस्मरण है , आत्मकथा है या यूं कहें तो मेरी डायरी का एक पन्ना है । इसे आखिरी पन्ना नहीं बोलूंगी क्योंकि मुझे अभी कुछ दिन और जीवित रहना है और जब तक जीवित रहूंगी हर रोज कुछ न कुछ लिखती रहूंगी ।
हां तो आज मेरे अदालत का आखिरी दिन था । वो मुकदमा समाप्त हो गया जो पच्चीस सालों से चल रहा था । इस मुकदमे में मैंने अपने लिए कोई वकील नहीं किया था और ना ही मैं खुद के लिए खड़ी हुई बल्कि मैं उन्हीं की वकालत करती रही पच्चीस वर्षों से जिन पर मुकदमा दायर किया था । यह मुकदमा अलिखित था और ना ही इसका कोई गवाह था । जो गुनाहगार था सिर्फ वही एकमात्र सबूत भी था गवाह भी और मुजरिम भी । हैरानी की बात है कि मैं अपने ही मुजरिम की वकील हूं । लेकिन इससे भी ज्यादा हैरानी की बात यह है की आज जीत मेरी हुई है लेकिन मेरा मुजरिम हारा नहीं है । वो तो अच्छा है की हमारी बहस और फैसले का सबूत कैद है सीसीटीवी कैमरा में , जिसे बहुत संभाल कर रखना चाहूंगी । दुनिया में यह पहला मुकदमा है जिसमें हारा कोई नहीं और जितने वाले का कोई वकील भी नहीं था बल्कि वो स्वंय अपने मुजरिम की वकालत करती रही ।
बहुत ही व्यक्तिगत समस्या थी । लेकिन भयानक समस्या थी , निदान जरूरी था लेकिन किसी तीसरे का दखल मंजूर नहीं है । इल्ज़ाम मैंने लगाया था इसलिए सामने वाला निरीह मतलब "बेचारा था " मैं न्याय की देवी कहलाती हूं तो मैं भला उस बेचारे के साथ अन्याय कैसे होने देती ....? इसलिए उनकी वकालत करती रही और जीत मेरी हुई । मैं खुश हूं , बहुत खुश हूं मैं चाहती थी कोई और हमारे झगड़े को नहीं सुलझाएं और सुलझ भी जाए मैं इनके खिलाफ न जाऊं और वो आत्मग्लानि भी महसूस न करे । कितना मुश्किल था यह मुकदमा सुलझना ...! इसीलिए तारीख पर तारीख पड़ती रही और देखते देखते पच्चीस साल लग गए । आज बहुत राहत महसूस हो रही है ।हम दोनों पति-पत्नी एक लम्बी लड़ाई लड़ते हुए साथ साथ रह रहे थें । इन सालों में एक भी त्यौहार , उत्सव या कोई भी जश्न ऐसा नहीं बीता जब हम दोनों साथ साथ पहुंच कर धमाल नहीं मचाएं हो । परिवार , मोहल्ला , सोसायटी हर जगह आदर्श युगल जोड़ी के रूप में मशहूर रहें हैं । लैला-मजनूं , रोमियो जूलियट , राधाकृष्ण और न जाने कितने कितने उपाधियों से नवाजे गये । दो प्रशस्ति पत्र भी मिला है आइडियल कपल का । दो चार ऐसे अवसर भी आएं जब लोगों ने पूछा कि राज क्या है आपके सफल और खुशहाल जीवन का । इसमें अगर अदाकारी कुछ मेरी थी तो कलाकार वो भी बड़े पहुंचे हुए थें । शिकायत कुछ मेरी थी तो वो भी किसी बात पर बहुत कूफ्त रहा करते थें लेकिन हम दोनों में से किसी ने कभी भी तीसरे से कोई शिकवा शिकायत नहीं की । ये बात और है कि हम दोनों के बीच एक अदृश्य था जिसे प्रि फर्स्ट की संज्ञा दे सकते हैं । हम दोनों के बीच कोई तीसरा नहीं कह सकते । क्योंकि हम दोनों के बीच कोई नहीं आया है । जबसे लग्न मंडप पर फेरे लेकर एक-दूसरे का साथ निभाने की कसम खाई थी उसके बाद कोई नहीं आया ।
आज बहुत खुश हूं । खत्म हो गया अलिखित मुकदमा । जीत मेरी हुई बिना उन्हें हराय । मैंने सोचा है लिख जाऊं कि मेरी शिकायत खत्म हुई । मेरे पति , मेरे परमेश्वर , मेरे हमसफ़र , मेरे हमनवां आज अपने "सुपर इगो " के शिकंजे से निकल कर आजाद होकर मुझसे कहा ........ कैद है वो सब बातें सीसीटीवी कैमरा में ।
