बासंती संजीवनी
बासंती संजीवनी
ग्रीष्म ऋतु की जलती हुई धूप में
सोनाली अपना का रंग निखारती
जितना जलती उतना खिलती तुम
जैसे कुंदन बनने का रहस्य बताती
पीत परिधान में सजी नई दुल्हन
अपने प्रेमी भ्रमर बृंद को रिझाती
सुनहरे चटक रंगों का चादर ओढ़े
चलते पथिक का भी मन मोह लेती
सुमन लड़ियों से सुरभित तेरा तन
बुलबुल तेरे झूमरों पर राग सुनाती
नृपद्रुम सादृश्य वर्णित देववाणी में
स्वर्णभूमि देश की तुम शोभा बढ़ाती
फल तुम्हारे तापमान मापक सदृश
वर्षाऋतु आने की पूर्व सूचना देती
हरित पर्णिका से आच्छादित किन्तु
उष्ण में बूँदरहित स्वर्णवृष्टि कराती
रंग है एक किन्तु तुम्हारे नाम अनेक
कहीं बहावा कहीं गरमाष्ठो कहलाती
जीवनदायी निराली संजीवनी तुम
अमलतास तीनों दोषों से मुक्ति देती।
