Rahul Wasulkar

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वृक्षताओं - भाग 2

वृक्षताओं - भाग 2

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( भाग १ में आपने पड़ा की किस तरह राजा विधुकर , वृक्षताओं को अपनी नगरी दिखाना का निमंत्रण दिया था अब आगे. )


विधुकर अपनी नगरी पहुँचकर , अपनी सारी प्रजा को , मूल राज्य जाने का आदेश दिया , और अपनी सैन्य शक्ति को कल तक सुबह नगरी में हाजिर होने का आव्हान दिया ।सारी प्रजा रातोंरात मणा जंगल से ना होकर , घुमावदार रास्ते से चल पड़ी । भोर हुई राजा विधुकर की सेना नगरी पहुँची ... 


सेनापति नगरी के बीच खड़े होकर .. 

सभी सैनिकों को आज प्रातः 10 बजे , महाराज विधुकर कुछ आदेश देंगे जिसका तुम सबको पालन करना होगा अन्यथा परिणाम तुम जानते हो । 


प्रातः 10 बजे चुके थे , विधुकर उचे मचान पर खड़े होकर ..


विधुकर- "सैनिकों आज संध्याकाल में तुम मणा जंगल से नगरी के लिए उपयुक्त लकड़ियां जमा करनी है और उस जंगल को आग लगानी है ।" (विधुकर ने आदेश दिया)


सैनिकों में हलचल बड़ी , सब एक दूसरे को देखने लगे , धीमी धीमी आवाज आने लगी जिस में वृक्षताओं का नाम सुनाई देने लगा ।


विधुकर - ( अपने एक सैनिक से )" ऐ आगे आ , बता क्या हुआ माथे पर पसीना क्यों छूट रहा है ।"


सैनिक - "म....म...हाराज वृक्षताओं हमे वैनगंगा नदी में फेंक देंगा ।" (जबान लड़खड़ाते हुए)


विधुकर -"हाहाहा वो कमजोर और मूर्ख वृक्षताओं , वो भी आज जलकर मरेगा । तुम सांध्यकालीन समय मे जब मूर्ख वृक्षताओं यह भव्य नगरी देखने आएंगा , तब तुम यह कार्य करना और जब सब खत्म हो जाये तब आग लगा कर निकल आना , आखिर आपने जंगल को बचाने वो मूर्ख वापस जाएंगा ही और बाकी काम अग्नि कर लेंगी । "


सैनिकों में अभी हिचकिचाहट थी, और धीमी धीमी आवाज में बड़बड़ा रहे थे ।


विधुकर -( क्रोध में ) "चुप हो जाओ सब , वरना अभी यही कि यही अग्नि का प्रकोप देखना पडेंगा ।"सेनापति सब को ले जाओ और रणनीति बता दो , कोई पीछे हटे तो उसी समय मार देना ।


सेनापति ने सैनिकों को रणनीति समझाई , कुछ सैनिक भेष बदलकर प्रजा बन गए , और वृक्षताओं के आगमन की तैयारी करने लगे , कुछ सैनिक तट के समीप मणा जंगल को देखकर जायजा लेने लगे.सांयकाल 6 बजे , नगरी में बहुत ज्यादा हलचल होने लगी , सैनिकों की बड़ी टोली तट के समीप जाकर छिप गयी , नगरी सजी धजी थी , कुछ सैनिक इधर उधर भाग रहे थे..


विधुकर - "सेनापति जश्न की तैयारी हो गयी ? वो मूर्ख आता ही होंगा ।"


सेनापति - "महाराज अब बस इंतजार है उस मूर्ख का ."


तट के समीप घने पेड़ो के बीच से वृक्षताओं आने लगा ..नगरी में


सेनापति - "सब सतर्क हो जाओ .. (कठोर और ऊंची आवाज में)"


वैनगंगा नदी पार करके , वृक्षताओं नगरी पहुँचा , भव्य द्वार से पुष्पों की बौछार द्वारा वृक्षताओं का स्वागत किया गया ।


विधुकर - ( नतमस्त होकर )"श्रीमान वृक्षताओं आपका स्वागत है.. मेरी यह नगरी जो आपकी देने है आपकी ही प्रतीक्षा कर रही है ।"


वृक्षताओं -" विधुकर तुम्हारी यह सज्जनता देखर में बहुत प्रसन्न हुआ । "


* उधर तट के समीप छिपी सेना , नदी पार करके , मणा जंगल मे जाने लगी । *


विधुकर -"श्रीमान वृक्षताओं , में स्वयं आपको अपनी नगरी दिखना चाहता हूँ ।"


वृक्षताओं - "अवश्य , चलो विधुकर ।"


विधुकर ने वृक्षताओं का ध्यान भटकाने के लिए जगह जगह , वृक्ष और पुष्प के पेड़ और झाड़ियां लगाई थी , पालतू जीवो को स्वतंत्र छोड़ा हुआ था ।

यह देख वृक्षताओं मंत्रमुग्ध हो कर नगरी में विचरण करने लगा ।उधर नदी पार ,विधुकर की सेना द्वारा एक एक कर मणा जंगल के वृक्ष काटे जा रहे थे , सामने जो जो पशु आता उसे मारा जा रहा था , कई पक्षी बेघर होने लगे , हर तरह बस कटे वृक्ष , पशुओं का रक्त और घोसले पड़े हुए थे ... 

बड़े वृक्षो को काट कर उपयुक्त लकड़ियां सैनिकों द्वारा तट के इस पार लाकर छुपाई जा रही थी . 

कई घंटों नगरी में घूमने के बाद , 


विधुकर -" श्रीमान वृक्षताओं , जंगल की तरफ देखिए उधर से तेज रोशनी आ रही है ।"


वृक्षताओं -" घबराकर ..कहां ? "


विधुकर - "श्रीमान जल्दी मेरे साथ आयी लगता है जंगल में आग लग गई है । जल्दी मुख्य द्वार से स्पष्ट दिखेंगा .."


वृक्षताओं विधुकर के पीछे दौड़ते हुए ... मुख्य द्वार तक पहुँचा और सामने देखा।।मणा जंगल अग्नि में धीरे धीरे समा रहा है , वृक्षताओं से रहा नही गया , वो जंगल की तरफ दौड़ने लगा ।


विधुकर - "तुम पहुँचो , वृक्षताओं हम आते है सैनिकों को लेकर मदद करने" (एक बेपरवाह हसी के साथ)


वृक्षताओं सीधा जंगल की तरफ दौड़ रहा था , ना इधर देखा ना उधर .. नदी पार करके जंगल तक पहुँच गया पर अंदर जा न सका , अग्नि की लपटें हर तरफ फैली हुई थी .वृक्षताओं के आंखो में आंसू , जंगल के अंदर से सभी पशु - पक्षियों की चीखें कानो में पड़ने लगी , सूखे पेड़ो के साथ हर भरे पड़े , झाड़ियों सब जलने लगी । 


तट के समीप से 

विधुकर - "ए मूर्ख , जा बचा ले अपने जंगल को और तू भी जल के वही मर जा ।" 

वृक्षताओं ने पीछे मुड़कर देखा तो विधुकर अपने सैनिकों के साथ हस रहा है , उनके पास कटे पड़े है और कई पशुओं की लाशें । वृक्षताओं क्रोधित होकर , विधुकर की और बढ़ता है , पर तभी जंगल से एक जलता हुआ पशु चीखों के साथ बहार आते हुए दम तोड़ देता है ।तब बिना सोचे समझे वृक्षताओं , पागलों की तरह चिल्लाते हुए मणा के भीतर घुस जाता है , दिल दहलाने वाली चीखे पशुओं की आवाजें पक्षियों के जलते हुए पंख जो जंगल के ऊपर तड़पकर उड़ रहे है ... 


विधुकर हंसते हुए - "कहा था ना मूर्ख है देखा मरने चले गया."नगरी की तरफ जाते हुए ।जंगल की यह हालत जैसे काले अंधेरे में पहली बार कोई रोशनी आंखों को चुभ रही हो ।वृक्षताओं ने भी समर्पण कर दिया भीतर गहरे जंगल में.. अपनी जड़ें जमीन में धसा दी और भुजाओं में जो बचे कूचे पशु - पक्षी थे सबको बाहों में लेकर बैठ गया । 


पूरा एक दिन जंगल जलता रहा ,.. दूसरे दिन हल्की बारिश की फुआर पड़ी जैसे वृक्षताओं के आंसू आसमान से टपक रहे हो । धीरे धीरे बारिश बड़ती रही , करीब 3 दिन लगातार बारिश हुई वृक्षताओं अपनी जगह से हिला नहीं बस अपने अंतिम पल का इंतजार करता रहा पर बारिश ने जंगल की आग बुझ गई , कहने को बस मध्य के कुछ घने पेड़ वृक्षताओं और कुछ प्राणी जीवित रह गए । 


जब बारिश रुक गई , हरतरफ धुंआ ही धुंआ और धुंए के बादल .. वृक्षताओं ने अपनी जड़ें जमीन से निकाल ली और अपनी बाहों से पशु - पक्षियों को आज़ाद किया ,पर आँसू अभी भी नही थमे , वो दौड़ा दौड़ा , विधुकर को कोसते हुए तट के करीब जा पहुँचा ।वृक्षताओं की आंखों ने जो दृश्य देखा वो अलग ही था ।पूरी नगरी तबाह हो चुकी थी , वैनगंगा नदी उफान पर थी बस हरतरफ नदी में बहता मलबा और सैनिकों की लाशें इधर उधर अटकी पड़ी... 

🔥एक देह सोन के वस्त्र और मुकुट के साथ वृक्षताओं के पैरों के नीचे भी था ।


वृक्षताओं ने वैनगंगा नदी को प्रणाम कर .. और वापस अपने घर अपने जंगल में चला गया ।



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