तिल का ताड़
तिल का ताड़
अजीत न जाने क्यू ज़ब से दफ्तर से आया था कुछ बुझा बुझा सा था , मानो किसी गहरी सोच ने उसे अपने अंदर डूबा रखा था, उसे इस तरह देख उसकी पत्नि विशाखा ने आखिर कार पूछ ही लिया।
क्या हुआ अजीत? सब ठीक तो है, ज़ब से दफ्तर से आये हो बुझे बुझे से लग रहे हो, आपकी तबीयत तो ठीक है , खाना भी अच्छे से नही खाया और अब यहाँ कमरे में भी गुमसुम बैठे हो, कुछ हुआ है क्या दफ्तर में।
अजीत ने अपनी पत्नि द्वारा एक सास में पूछे गए सवालों का जवाब देते हुए कहा " नही तबीयत तो ठीक है, बस आज ऑफिस में कुछ ऐसा हुआ जिसे देख कर अपना अतीत याद आ गया , आज अतीत में की गयी गलती मेरे सामने आ गयी और मैं चाह कर भी कुछ कर नही सका। "
"क्या मतलब? तुम्हारा आपका इस बात से, भला ऐसा भी क्या हुआ आज दफ्तर में और कौन अतीत से वापस आ गया, कही तुम्हारा किसी लड़की के साथ कोई चककर वक्कर तो नही था, मुझसे शादी करने से पहले , क्यूंकि तुम्हारे चेहरे पर आ रही चिंता की लकीरें मुझे ये सब सोचने पर मजबूर कर रही है " विशाखा ने कहा
"अरे! नही ऐसा कुछ नही है, तुम औरते भी न तुम लोगो का सबसे पहले शक दूसरी औरत की तरफ ही जाता है , आदमी ज़ब कभी भी परेशान नज़र आता है " अजीत ने थोड़ा चिढ़ते हुए कहा
विशाखा थोड़ा शर्मिंदा हुयी और अजीत का हाथ अपने हाथ में रख कर बोली " अरे! मैं तो बस मज़ाक कर रही थी , मैं जानती हूँ आप मेरे अलावा किसी और को नज़र उठा कर भी नही देख सकते , चलये अब बता भी दीजिये की ऐसा कौन आपके अतीत से निकल कर सामने आ गया जिसे देख आप इतना उदास हो रहे है, नही तो मैं फिर समझूँगी की ज़रूर आपका मुझसे पहले किसी और के साथ अफेयर रहा होगा।"
अजीत ने उसकी तरफ देखा और बोला " घबराओं नही ऐसा वैसा कुछ नही है , बस आज बरसों बाद अपने साथ पढ़ने वाले दोस्त को इस तरह सही सलामत देख अपने दफ्तर में चौक सा गया , और न चाहते हुए भी उसका सामना करना पड़ा "
"ऐसा क्यू? बरसों बाद साथ पढ़ने वाला दोस्त दफ्तर में कुलीग बन कर सामने आया , इससे ज्यादा क्या ख़ुशी की बात हो सकती है , लेकिन आप क्यू चौक गए और उससे अजनबी की तरह क्यू मिले, जबकी आपको तो खुश होना चाहिए " विशाखा ने कहा
"सही कहा तुमने, मेरी जगह कोई और होता तो शायद यही सब करता, लेकिन मैंने जो कुछ उसके साथ किया था, उसके बाद तो मैं उससे नज़रे भी नही मिला सकता , गले मिलना तो दूर की बात है, जिस छोटी सी बात को मैंने तिल का ताड़ बना कर उसे सबके सामने न जाने क्या कुछ नही कह दिया था , और वो बेचारा अपनी सफाई देता रहा पर मैंने एक न सुनी और उसकी और अपनी दोस्ती की परवाह किये बिना ही उससे सारे नाते तोड़ दिए , अब तुम ही बताओ क्या मेरी जगह तुम होती तो उससे मिल पाती नही न, इसलिए मैं भी नही मिल पाया बस दूर खड़ा उसे देखता रहा और अतीत में बिना सोचे समझें की गयी गलती पर पछताता रहा और सोचता रहा जिस खातिर मैंने वो सब कुछ किया, अपनी दोस्ती को भी तोड़ दिया स्कूल में अच्छे नंबर लाकर, क्लास का टोपर बन कर, सरकारी कॉलेज में इंजीनियरिंग की सीट हासिल करके, इंजीनियरिंग करके एक अच्छी नौकरी पाकर सब के सामने सीना चौड़ा कर पाने की चाह में मैंने वो सब किया जो मुझे नही करना चाहिए था शायद क्यूंकि जो मेरी किस्मत में ईश्वर ने लिखा था वो तो मुझे मिलकर ही रहना था
लेकिन फिर भी मैंने वो सब किया जो शायद नही करना चाहिए था , उस दिन अगर में उस छोटी सी बात को वही दर गुज़र कर देता, तिल का ताड़ न बनाता तो शायद आज अपने दोस्त को अपना सहकर्मी बनता मुझे जितनी ख़ुशी होती उतनी किसी को भी न होती " अजीत की आँखों में नमी थी ज़ब उसने ये सब कुछ कहा पास बैठी विशाखा से
विशाखा उस बात को जानने के बाद असमंजस में थी इसलिए उसने पूरी बात जानने की इच्छा जताई ताकि वो पूरी बात जान कर कोई सही निर्णय ले सके , उसने अजीत से जो कुछ उसके और उसके दोस्त के बीच घटा था उसे जानने को कहा
अजीत भी बता कर अपना बोझ हल्का करना चाहता था इसलिए उसने अपनी नज़रे झुकाते हुए और उन पलों को याद करते हुए कहा " ये बात है उन दिनों की ज़ब मैं और मेरा दोस्त अभय 12 वी कक्षा में थे, दस वी में हम दोनों ने अच्छे नंबर लाये थे, लेकिन बारहवीं में मुझे उससे अच्छे नंबर लाना थे,
हम दोनों अच्छे दोस्त तो थे ही मगर हम दोनों में स्कूल में कौन प्रथम आएगा इस बात को लेकर हमेशा प्रतिस्पर्धा रहती थी ।बात उन दिनों की है ज़ब 12 वी की बोर्ड परीक्षा होने को थी , मेरे पास एक रजिस्टर था जिस पर मैंने अपने नोट्स बनाये थे , ताकि एग्जाम के समय याद करने में आसानी हो जाए।
धीरे धीरे एग्जाम के दिन करीब आ रहे थे हम सब चिंता में थे, सबसे ज्यादा चिंता हम दोनों को एक दुसरे से ज्यादा नंबर लाने की थी , स्कूल बंद होने से पहले एक दिन रविवर को अभय मेरे घर आया हम दोनों ने मिलकर पढ़ाई की और ज़ब वो चला गया तब मैं सो गया ताकि रात को अच्छे से पढ़ सकूँ।
उस रात जब मैंने अपनी वो नोटबुक देखी जिसमे मेरे नोट्स बने हुए थे , वो कही खो गयी थी मैंने सब किताबों में देखा किन्तु वो कही नही मिली।काफ़ी देर बाद मेरा ध्यान अभय पर गया, क्यूंकि वो सुबह मेरे घर पढ़ने आया था, उस पर ध्यान इसलिए गया क्यूंकि उस दिन से पहले वो कभी मेरे साथ मेरे घर पढ़ने नही आया था, हम दोनों अपने अपने घरो पर पढ़ाई करते थे।
और स्कूल में आकर बताते थे की किसने कितने चैप्टर याद कर लिए है, उसी के साथ साथ उसे मेरी बनायीं वो नोट्स बुक बहुत अच्छी लगती थी और वो हमेशा उसे मुझसे छीनने की बात करता था।
इन सब बातो को ध्यान में रखते हुए मेरा शक उसपर ही गया, और मैंने बिना कुछ सोचे समझें उस छोटी सी बात को तिल का ताड़ बना कर पूरी क्लास के सामने उसे चोर बना दिया जबकि वो कहता रहा की उसने वो नोटबुक नही चुराई है, उसे वो पसंद ज़रूर थी लेकिन उसने नही चुराई।
मैं समझता रहा की परीक्षा में मुझसे अच्छे अंक लाने के खातिर उसने ये सब कुछ किया
उस दिन का दिन था हमारी दोस्ती में दरार पड़ गयी, मुझे लगता रहा की उसने ही नोटबुक चुराई है, सारी परीक्षाएं अच्छे से हो गयी थी , किसी भी इम्तिहान में मैंने उससे बात नही की वो मुझसे कहता रहा की वो चोर नही है लेकिन मैंने एक न मानी और उसे न जाने क्या कुछ कहता रहा
आखिर कार एग्जाम के बाद परिणाम भी घोषित हो गया और मैंने अच्छे अंक प्राप्त किये, मैंने अभय को फिर बहुत कुछ सुनाया उस दिन के बाद वो कही चला गया शायद उसके पापा का ट्रांसफर हो गया मैं आख़री बार उससे मिला भी नही
या यूं कहे उसने मुझसे मिलना नही चाहा, और वहाँ से चला गया मुझ पर गुस्सा हो कर
मैंने भी IIT की तैयारी शुरू कर दी और एंट्रेंस निकाल कर इंजीनियरिंग में दाखिला ले लिया
फिर एक दिन दिवाली पर ज़ब घर में साफ सफाई चल रही थी, मैं भी हॉस्टल से घर आया हुआ था तब अचानक मेरे बेड के नीचे से एक किताब निकली जिसे देख मैं दंग रह गया, वो तो वही नोटबुक थी जिस पर मैंने नोट्स बनाये थे, और जिसके खातिर मैंने अपने बेकसूर दोस्त को न जाने क्या कुछ कह दिया
उस दिन के बाद मैंने उसे हर जगह ढूँढा ताकि उससे माफ़ी मांग सकूँ पर शायद बहुत देर हो चुकी थी , पुराने घर जाकर पता चला की वो तो किसी और शहर चले गए है और वहाँ का कोई अता पता भी नही है
फेसबुक पर भी तालाशा पर शायद वो किसी और नाम से फेसबुक चलाता होगा इसलिए ढूंढ नही सका, पुराने दोस्तों से भी मिला पर वहाँ भी कुछ पता नही चला
तब से अब तक उसकी माफ़ी का बोझ अपने सीने पर लिए घूम रहा हूँ, और अब ज़ब वो मिला है तो चाह कर भी अपने किये की माफ़ी नही मांग सकता डरता हूँ कही उसने भी वही सब कुछ किया मेरे साथ जो मैंने किया था तब मेरा क्या होगा,
अब शायद मैं उस दफ्तर में काम भी न कर सकूँ क्यूंकि उससे माफ़ी मांगने की हिम्मत मुझमे नही है क्या पता वो माफ करे या न करे, और इस तरह मैं अपने सीने पर ये बोझ रख कर उसके साथ काम नही कर सकता , इसलिए मैं कल ही रिजाइन दे दूंगा "
अजीत और अभय की दास्तां सुन विशाखा थोड़ी देर तो खामोश रही किन्तु थोड़ी देर बाद बोली " आपने गलती तो की है, आपने अपने दोस्त का दिल दुखाया है लेकिन अब ज़ब आपको अपनी गलती का एहसास हो गया है, तो लिहाजा आपको उससे एक बार माफ़ी मांग लेनी चाहिए शायद ईश्वर ने इसलिए ही उसे आपका सेहकर्मी बना कर भेजा हो,
मुझे यकीन है, ज़ब एक दोस्त अपने दुसरे दोस्त के माफ़ी के लिए उठे हाथ देखेगा और उसकी आँखोंमें पछतावे के आंसू देखेगा तब वो पहला दोस्त सब कुछ भूल कर अवश्य माफ कर देगा, यही तो सच्ची दोस्ती की पहचान होती है
आप एक बार कोशिश कीजिये , बिना कोशिश किये हार मान लेंगे तो जिंदगी भर उसके माफ़ी के बोझ को उठाये घुमते रहेंगे।
अजीत को विशाखा की बाते समझ आ रही थी इसलिए उसने उससे माफ़ी मांगने का इरादा बना लिया फिर चाहे वो उसे माफ करे या सबके सामने जलील उसे मंजूर था।
