STORYMIRROR

अख़लाक़ अहमद ज़ई

Others

4  

अख़लाक़ अहमद ज़ई

Others

सोख़्ता (उपन्यास) - 10

सोख़्ता (उपन्यास) - 10

11 mins
343


        भारत और पाकिस्तान के बीच खेले जा रहे वन-डे सिरीज पर संभावना लिखते-लिखते अचानक जामिन की याद आ गयी। इतने दिनों बाद। इस परिवार विहीन, परिवार विहीन ही कहा जायगा क्योंकि इतने बड़े धर्मशाला में दो-तीन औरतें, दो बच्चे कोई मायने नहीं रखते। धर्मशाला में जामिन के एहसास की रंगत ज्यादा गाढ़ी लगी। ज्यादा दिन हुआ, अम्मा-अब्बा का भी खत नहीं आया वरना मुमकिन था, जामिन का कोई जिक्र होता।

        सादिक की भी याद आयी। सादिक का मामला कहाँ जाकर ठहरा होगा? पता नहीं उसकी जिन्दगी का रुख बदला या नहीं? और कहीं बदलाव आया हो या न आया हो लेकिन इन तीन महीनों के बीच धर्मशाला में जरूर बदलाव आ गया है।

        मैं दानिश के साथ ऊपरी फ्लोर पर आ गया हूँ। सरल उसी जगह पर अब गार्ड के पार्टनरशिप में है। बगल का एक नया कमरा खुल गया है, उसमें दिनेश अपनी पत्नी के साथ रह रहा है। सदानंद अपने बीवी-बच्चों के साथ ज्यों का त्यों बने हैं। मेकअप-मैन झा हमारे बगल वाले कमरे में जमे हुए हैं।

        इस बदलाव के साथ-साथ ऑफिस की कुर्सियां भी बदल गयी हैं। दानिश के पास देश-विदेश और जिले-जिले की खबरें चली गयी हैं इसलिए दानिश का दबदबा शहर में कम हो गया है। लोकल पेज दिनेश के पास चला गया है। संपादक, प्रबंधक से लेकर शहर के बड़े-बड़े अधिकारियों तक दिनेश की पैठ गहराती जा रही है। दानिश के सिरदर्द का सबब भी यही है।

   "जब से दिनेश की बीवी आयी है, प्रबंधक और संपादक जी जब देखो तब दिनेश के रूम में जमे रहते हैं। पहले झांकने तक नहीं आते थे कि धर्मशाला अपनी जगह पर है भी या खिसक कर कहीं दूसरी जगह चला गया है।" दानिश ने बाहर पानी भर रही दिनेश की पत्नी को देखकर कहा।

   " तुम्हें क्यों जलन हो रही है?"

  " जानते हो, आज रात दो बजे तक दिनेश के रूम में जाम ढाले गये हैं। जिस दिन मुझे बीवी को ढाल बनाकर नौकरी करनी पड़ी, उस दिन नौकरी को लात मार दूंगा।… अफरोज, तुम सिर्फ तमाशा देखो। दिनेश ने मुझसे लोकल पेज छीना है न! मैं ऐसी गोट फिट करूंगा कि इनको प्रेस ही छोड़ना पड़ेगा। तुम बस तमाशा देखो। ये बेटा शतरंज की गोट चल तो गये हैं पर मात देना सिर्फ मुझे ही आता है। मेरी प्लानिंग सुनो।" दानिश ने चुटकी बजायी।

  " एक अधिकारी है, नाम नहीं बताऊंगा, उससे संपादक जी को बिजनेस में कई तरह के फायदे हैं। कुछ दिन पहले उस अधिकारी द्वारा विभाग में किए गये लाखों रुपयों के घोटाले का पूरा बायोडाटा मेरे हाथ लग गया। उस मैटर को मैंने वहीं दबा दिया लेकिन अब उसी मैटर की कापी एक युवा नेता है, उसको दे दी है। उस अधिकारी से विभागीय कर्मचारियों में भी असंतोष है इसलिए वह नेता उन कर्मचारियों के सहयोग से एक आन्दोलन खड़ा करेगा। आन्दोलन शुरू करने की सूचना मैं उसे तब दूंगा जिस दिन संपादक जी डीएवीपी की मान्यता के लिए दिल्ली जाएंगे। संपादक जी को दिल्ली में एक हफ्ता लगेगा और इस एक हफ्ते में आंदोलन और उस अधिकारी के बाबत अखबार में दिनेश द्वारा बहुत कुछ छापा जा चुका होगा। संपादक जी के लौटने के बाद अगर वो अधिकारी को मनाकर उससे होने वाले फायदे को बरकरार रखना चाहेंगे तो उन्हें दिनेश को अखबार से निकालना ही पड़ेगा। और अगर निकालते नहीं हैं, सिर्फ पेज से हटाते हैं तो किसी तीसरे से उस अधिकारी के कान भरवा दूंगा।"

  " लेकिन यह भी तो संभव है कि अधिकारी सस्पेंड कर दिया जाय या उसका ट्रांसफर हो जाय।" मैंने आशंका जताई।

  " खैर, यह तो बाद की बात है लेकिन पेज तो वापस मेरे पास आ ही जायगा! यह तो तय है।… दो दिन लोकल पेज तुम्हारे पास भी तो था!… वो तुमने एक हेडिंग लगायी थी, 'जिलाधिकारी का घेराव : आश्वासन मिला।' उस पर संपादक जी तुमसे कुछ कह रहे थे!"

  " डीएमने शिकायत की थी, वही कह रहे थे कि जब तक मान्यता नहीं मिल जाती तब तक डीएम और सूचना अधिकारी के लिए ऐसी हेडिंग या समाचार नहीं जानी चाहिए जो खिलाफ में बोलते हों।"

        दानिश जोर से हंस पड़ा।

  " जब अपने फायदे के लिए 'घेराव' शब्द पर रोक लगा सकते हैं तो फिर हमारी गोट फिट समझो।"

  " अच्छा, आफिस चलते हो? टाइम हो रहा है।" मैंने टोका।

  " दो मिनट। सिर में झाड़ू मारकर आता हूँ।"

        रास्ते में एक खद्दरधारी युवक मिल गया तो दानिश ने उसे एक किनारे ले जाकर कुछ बातें की। उसके जाने के बाद दानिश ने बताया कि यह वही युवक है जो उस अधिकारी के खिलाफ आंदोलन छेड़ने वाला है सारी तैयारियां अंदर ही अंदर हो रही हैं।"

   "दानिश, शांति भाई ने एक गीत भेजा था छापने के लिए। चूँकि जब तक अखबार को मान्यता नहीं मिल जाती तब तक सत्ता के खिलाफ कुछ छप नहीं सकता लेकिन उसका एक मुखड़ा तुम्हें सुनाए दे रहा हूँ --

         बेनकाब चेहरों पर फिर नकाब डालेंगे,

         देश वे संभाले थे, देश ये  संभालेंगे।

        इनकी पगध्वनि सुनते,सत्ता के गलियारे,

        ऊपर तो धवल वस्त्र पर, अन्तर के काले,

        मधुकर तो मधुपायी बस, मधु ही ढालेंगे।

        बेनकाब चेहरों पर फिर नकाब डालेंगे,

        देश वे संभाले थे, देश  ये   संभालेंगे।

   "नेता चाहे छोटा हो या बड़ा, मक्कारी तो कूट-कूट कर भरी होती है। लेकिन कोई उन्हें अपने हित में इस्तेमाल कर ले, यह बहुत बड़ी बात है। मुझे मजबूरन कहना पड़ेगा कि तुम महान हो!"

        दानिश ठट्ठाकर हंसने लगा।

   "मजबूरन क्यों?"

   "मजबूरन इसलिए कि मक्कार को इस्तेमाल करने वाला उससे बड़ा मक्कार तो होगा ही।"

   " साले…।" दानिश ने हंसते हुए एक धौल जमा दी।

   " यह बात अपने तक ही रखना।"

   " दानिश मेरा दिमाग ब्लाॅटिंग पेपर है। स्याही सोखने के बाद, अगर अक्षर अपनी छाप न छोड़ तो उसे खुद को भी पता नहीं रहता कि यह स्याही कहां से उठायी गयी है।"

        आफिस में घुसते ही हम दोनों लगभग बुझ से गये। सभी की मौजूदगी के बावजूद अजीब तरह का सन्नाहटा छाया हुआ था। पहले तो इधर-उधर सूंघने की कोशिश की। जब अंदाजा नहीं लगा पाया तो सरल के टेबल के करीब जाकर मैंने इशारे से पूछा--" क्या बात है? "

  " संपादक जी बहुत गुस्से में हैं।"

  "क्यों…?"

        सरल ने कुर्सी की तरफ इशारा किया।

   "बैठो, अभी बताता हूँ।"

   "खैरियत तो है?" मुझसे सब्र नहीं हो रहा था। सरल बिना मेरी तरफ देखे, मुस्करा दिया। बोला कुछ नहीं।

        थोड़ी देर बाद संपादक जी केबिन का स्लाईड दरवाजा सरका कर निकले और दानिश से कुछ कहकर बाहर चले गये। संपादक के जाते ही सभी चहकने लगे। मैंने सरल से फिर पूछा--"क्या हुआ?"

   "संपादक जी का कोई दोस्त है 'ईश्वरचंद' करके। उसके लड़के की कल मौत हो गयी। उसका शोक समाचार संपादक जी ने भिजवाया छापने के लिए। छपने के बाद पता चला कि अखबार में ईश्वरचंद के पुत्र के बजाय खुद ईश्वरचंद मरे पड़े हैं। सरल के साथ आसपास बैठे लोग हंस पड़े। मेरी भी हंसी छूट गयी।

   "हुआ कैसे?"

   "वह जावेद है न! उसकी कम्पोजिंग में गलतियां ज्यादा रहती हैं इसलिये नदीम प्रूफ चेक करने के बाद दूसरा मंगवाता है। इसी बात को लेकर जब-तब दोनों में गर्मा-गर्मी भी हो जाती है। कल जावेदवा को मौका मिल गया। उसने शोक समाचार से 'के पुत्र' उड़ा कर कम्पोज कर दिया। नदीम ने भी प्रूफ पास कर दिया इसीलिए संपादक जी नदीम के ऊपर गरम थे।"

*****

  " अफरोज!" दानिश की आवाज़ सुनायी दी।

        मैंने घूमकर देखा, दानिश दूसरे कमरे में अपनी मेज के सामने बैठा अखबार की फाईल उलट रहा था। मैं समझ गया, संपादक जी के दिल्ली जाने की तैयारी हो रही है। मैं उठकर दानिश के सामने आ खड़ा हुआ।

  " क्या है?" मैंने पूछा।

  " इसे उठाओ।" दानिश ने अपने पैर के पास रखे अखबारों की फाइलों की तरफ इशारा किया।

        मैं एकदम सन्नाटे में आ गया। गुस्से से चेहरा जलने लगा। थोड़ी देर तक मैं बुत की तरह खड़ा, दानिश को देखता रहा फिर धीरे से बोला--

   "दानिश, मैं वहाँ से नौकरी छोड़कर आया हूँ तो इसका मतलब यह नहीं है कि मैं यहाँ से जाने के बाद भूखों मर जाऊंगा।"

        कुर्सी पर बैठे-बैठे दानिश ने झुककर फाईल उठा ली।

   "अफरोज, तुम गलत समझ रहे हो।"

   " मुझे पुकारने से पहले भी तुम इसी तरह फाईल उठा सकते थे।"

        मैं घूमा और आकर अपनी कुर्सी पर बैठ गया। मैं बिल्कुल तय नहीं कर पा रहा था कि मेरे ऊपर किए गये एहसान को इस्तेमाल करने की यह कोशिश थी या मेरे ऊपर अपने प्रभाव को स्टाफ के बीच मात्र दर्शाना। मुझे पुकारने के पीछे फाईल न उठा पाने की मजबूरी तो कत्तई नहीं हो सकती। मैं बुरी तरह उलझता जा रहा था। काम करने का मूड तो बिलकुल ही नहीं रह गया था।

        मैंने मेज के ड्राअर से एक क्रिकेट मैग्जीन निकाल ली लेकिन पन्ने उलटते ही पता चल गया कि उसे उलटना बेमतलब ही है। मैग्जीन फिर उसी ड्राअर में रख दिया और उठकर बाहर होटल में जाकर बैठ गया।

   "श्याम, एक कड़क चाय।"

        सामने टेबल पर पड़े अखबार को हाथ बढ़ाकर उठाया फिर समेटकर रख दिया। मैं फिर उठकर खड़ा हो गया।

   "संपादक जी, चाय।" श्याम ने टोका।

   "आॅफिस में भेज देना।"

        मैं वापस अपने टेबल पर आ गया। मेज पर पेपर-वेट से दबे टेलीप्रिंटर के कुछ समाचार और कुछ लिफाफे दिखे। समाचार के नीचे से मैंने लिफाफे खींच लिए। तीन खत थे और तीनों बलरामपुर से आए थे।

*****

                                                          5-12-86

                                                          बलरामपुर

   डियर भाई अफरोज,

                      प्यार।

                      सारे हालात, सारे वाक्यात से तुम बखूबी वाकिफ हो। अच्छे दोस्त, साथी, भाई की तरह तुमने हर बातें मुझे जोरदार सच के नजदीक लाकर समझाया पर मैंने वही किया जो मुझे करना था। पिछले माह की अन्तिम सप्ताह में कोर्ट-मैरिज कर लिया यानी अपनी तरफ से खेल खत्म कर दिया। अब आने वाला कल क्या-क्या करिश्मा दिखाएगा, कुछ जानता भी हूँ और कुछ नहीं भी। अनहोनी की हर पल प्रतीक्षा करता हूँ।

        तुम्हारी धारणा मेरे प्रति क्या है या क्या होगी, यही सोच कर कभी-कभी परेशान हो जाता हूँ। पर मैं कैसा हूँ, क्या हूं, इतना तो निश्चित है कि तुम्हारी हमदर्दी मेरे प्रति होगी। छोटा भाई तनवीर अब्बू के साथ आया था। तुम्हारा खत दिया। तुमने फिर अच्छी बातें लिखीं पर अफसोस, भाई मुझे अपने-आप को तोड़ना-मरोड़ना था, वह मैं कर चुका।

        मैं अपने ढंग से, अपनी तरह जीना चाहता था और जीना चाहता हूँ। बहुत कुछ सहता रहा। अब नपुंसक समाज की परवाह नहीं। भावनाओं की आंखमिचौली से बहुत तंग आ चुका था। अब यह बाजी हारना नहीं चाहता था पर शायद हुआ ऐसा कि बाजी हारते हुए आखिरी दांव पर मैंने पूरे वजूद की बाजी लगा दी और दीवालिया होकर काफी हैरान हूँ। अब सिवाय आत्मग्लानि का बोझ ढोने के, मेरे पास दोस्त, कोई चारा नहीं है। नारी के प्रति विद्रोह की भावना ने मुझको मिटा दिया। काश, मैं किसी अच्छे काम के लिए खुद को मिटाता।

        अफरोज, मैं तुम्हारी तरह जीना चाहता था पर जिद में ऐसा कर लिया जिसका कोई समाधान नहीं है। तुम मुझे प्रिय हो, आदर्श हो। मेरे बहुत अच्छे मानसिक साथी हो। खुदा करे, तुम अच्छी तरह रहो, जिस तरह रह रहे हो। घर पर लोग नार्मल हैं। धीरे-धीरे चैप्टर क्लोज कर रहे हैं। मैं भी सामान्य हूँ। मुस्लिम विधान से अभी शादी नहीं की है। हो जाने या न होने पर सूचित करूंगा।

                                                      तुम्हारा

                                                       सादिक

****                        ******           *********

                                                      6-1-87

                                                     बलरामपुर

   प्रिय अफरोज भाई,

             सप्रेम नमन।

             क्या हाल है गुरू? क्या कर रहे हो? कैसे हो? लिखना।

             आज सुबह सुरेश पाठक से मिला तो पता चला कि तुम भी जौनपुर की दिशा में पलायन कर गये हो।              

             सच, आज तुम्हारे अभाव का प्रथम अनुभव काफी हाहाकारपूर्ण रहा। दानिश भाई का क्या हाल है? बलरामपुर आना तो मुझसे मिलना। नये-नये अनुभवों का हिस्सेदार बनना चाहता हूँ।

             एक मैं हूँ जो बलरामपुर में सड़ रहा हूँ। तुम ही लोग मजे में हो। अपने आप निर्मित। अपने आप के निर्णायक।

                पत्रोत्तर मिलता तो स्फूर्ति होती। मजे में।

                                               तुम्हारा अपना

                                                सलिल पंडित

*****                    ********       **********

                                                   23-1-87

                                                   बलरामपुर

   अफरोज,

                प्यार।

               मैं यहाँ पर फिलहाल खैरियत से हूँ। अखबार बराबर मिल रहा है। इस समय तुम्हारी स्थिति क्या है? अपने बारे में विस्तार से लिखो। तुम्हारे घर पर सभी ठीक हैं। मेरा अभी तक घर से कोई सम्बन्ध नहीं बन पाया। मैं कितना क्रूर बनूं! संवेदनाएं पीछा नहीं छोड़ती। जिद पूरी कर ली, अब उसकी जिन्दगी भी मेरे सहारे है। सिर्फ एक गम है कि बच्चे न छूटते। मैंने भी कभी यह नहीं चाहा था पर कर ही क्या सकता हूँ? सिवाय तुम्हारी भाभी को खुश रखने के। वह तुम्हें याद करती है, बड़ी आत्मीयता से। अहमद आया था। तबस्सुम से मिलवाया पर उसने परदा किया।

                 अपनी आर्थिक स्थिति के बारे में लिखो। ज्यादा परेशानी हो तो मुझे लिखो। तुम किसी तरह अपने आप को बनाओ। दानिश तुम्हें चाहता है, उसी के निर्देश पर चलो। पहले से फिलहाल मैं ठीक हूँ। प्रैक्टिस भी ठीक चल रही है। अभी तक तो कोई समस्या नहीं है। आगे पता नहीं।

                                                       तुम्हारा

                                                      सादिक

******

       

        पत्र पढ़ने के बाद मुझे अपने अन्दर हल्कापन महसूस हुआ। मुझे लगा, इस वक्त वाकई मुझे किसी हमदर्द की जरूरत थी। मैंने पत्रों को दुबारा पढ़ा। फिर तिबारा पढ़ा--'अपने आप निर्मित। अपने आप के निर्णायक।', 'दानिश तुम्हें चाहता है, उसी के निर्देश पर चलो।' इन दोनों वाक्यों में कोई समानता न होते हुए भी एक ही में गुंथे हुए से लगे। मैंने दोनों पत्रों को आमने- सामने रखकर एक साथ कई बार पढ़ा। फिर मुझे लगा कि अगर दानिश से दोस्ती कायम रखनी है तो इन दोनों वाक्यों में से किसी एक का चुनाव मुझे करना ही पड़ेगा।

        मैं धीरे से मैनेजर-कम-एकाउंटेंट के कमरे में घुसा और जाकर मेज के करीब खड़ा हो गया।

   "शेखर साहब, सौ रूपए की जरूरत है। तबियत ठीक नहीं है। दवा लानी है।"

        मैनेजर ने बगैर नजर उठाए, रजिस्टर पर कलम घसीटते हुए रूखा-सा जवाब दे दिया--

   "सौ तो नहीं है, दस-बीस पड़े होंगे। इससे काम चले तो चला लो फिर बाद में देखते हैं।"

        मैनेजर ने एक झटके से ड्राअर खींचा तो अन्दर घुसे नोट बाहर की तरफ लुढ़क आये।

   "साहब, सौ रूपए पूरा दे दो न। जरूरत है इसलिए मांग रहा हूँ।"

        आगे को लुढ़क आये नोटों पर मैनेजर हाथ रखे, थोड़ी देर कुछ सोचते रहे फिर सौ रूपये निकालकर दे दिए और इंट्री के लिए रजिस्टर के पन्ने पलटने लगे।

        नोट हाथ में आते ही मैंने पूरी तरह तैय कर लिया कि अब मुझे यह शहर छोड़ देना चाहिए।

                             --: समाप्त :--



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन