राजनारायण बोहरे

Others


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राजनारायण बोहरे

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सनकी सुल्तान

सनकी सुल्तान

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ऐतिहासिक कहानी


उस दिन सारे दरबारी एक अजीब तरह की टोपी लगा कर आये थे। ऐसी टोपी लगा कर आदमी बंदर की तरह दिखता था। इसी वजह से सब अपनी हंसी नहीं रोक पा रहे थे। सुल्तान के आते ही जैसे सांप सूंघ गया। उन्ही के हुक्म से तो सबने यह बाना धारण कर रखा था। सुल्तान खुद वैसी ही टोपी लगाये थे। उन्ही ने फरमान जारी किया था कि सुल्तान के दरबार में सब चोंचदार टोपी लगा कर आयेंगे। पता नहीं क्यों शाम होते-होते यह फरमान वापस ले लिया गया।

कुछ दिन बाद फरमान जारी हुआ कि सारे वजीर वेश बदलकर फकीर के बाने में रोज रात को बस्ती में जायेंगे और जनता के सुख-दुःख को जानेंगे। वजीरों की मजबूरी थी सो उन्होंने काम तो किया, लेकिन इस काम को भी वे हंसी-मज़ाक समझने लगे। फकीर के बाने में भी वे अपनी हाकिम होने की हेकड़ी को भुला नहीं पाते थे सो उन्हें फकीर समझकर जो भी अकड़ के बोलता, उनमें से किसी न किसी को वे अपने अपमान के जुर्म में हवालात में डलवा कर लौटते। सुल्तान तक खबर पहुंची कि वजीरों के वेश बदल कर घूमने से जनता परेशान है तो उन्होंने उसी रात फरमान वापस ले लिया।

ऐसे एक नहीं दर्जनों तमाशे थे जो सुल्तान चाहे जब कर बैठते।

बात मध्यकाल की है दिल्ली पर मोहम्मद बिन तुगलक नाम का सुल्तान राज्य किया करता था। तुगलक एक सनकी और जिद्दी स्वभाव का आदमी था। कोई शायद ही विश्वास करे, लेकिन यह बात सौ फीसदी सच है कि दिल्ली की गद्दी पर कुछ समय के लिए इस सनकी व्यक्ति ने राज्य किया था। बात मध्यकाल की है जब भारत पर गुलाम वंश का राज्य था। संयोग से दिल्ली के तख्त पर मोहम्मद बिन तुगलक ने राजकाज संभाल लिया। सुल्तान के स्वभाव से अपने बचपन के दोस्त और वफादार वजीर महमूद कासिम व रियासत के सारे वजीर परेशान थे।

फिर एक बड़ी घटना घटी जिससे तहलका मच गया। ...मोहम्मद तुगलक को दिल्ली की गद्दी पर बैठे कुछ ही दिन हुये थे कि उन्हें सनक उठी कि वे अपना पूरा राज्य देखेंगे सुरक्षा के नाते यह उचित न था। वजीरों ने बहुत समझाया कि कुछ दिन बाद आपकी सैर का इंतज़ाम कर दिया जायगा। लेकिन सुल्तान न माने। वे सफर पर जाने के लिए बेताव थे।

 फिर क्या था! इस जंगी यात्रा का बंदोबस्त किया जाने लगा।

बहुत से घोड़ों, पालकियों और हाथियों से सजा सुल्तान का काफिला दिल्ली से कूच करने लगा, तो सुल्तान ने दिल्ली की रखवाली के लिये वफादार वजीर महमूद कासिम को दिल्ली में छोड़ दिया। कासिम को सुल्तान के हुकम से दिल्ली में रूकना पड़ा, लेकिन उनका मन बेचैन हो गया। इस सफर में सुल्तान को कोई वजीर गलत सलाह देकर जनता के खिलाफ कोई फैसला न दिलवा दें , कासिम को यही चिन्ता सता रही थी।

सुल्तान के काफिले का दोआब के हरे-भरे खेतों के बीच जहां पड़ाव डाला गया, वहां दो-आब के गरीब किसानों ने ही सुल्तान की आवभगत का बन्दोबस्त किया था। किसानों ने जी-जान लगा के इसलिये यह व्यवस्था की थी कि देश का सुल्तान पहली बार उनके बीच आया है, सो कोई कसर न रह जाये। मिठाईयां, तरकारियों और जाने कितनी तरह की रोटियों जैसा सारा सामान देशी घी से बनाया गया और सुल्तान के लिये जिन बर्तनों में भोजन परोसा गया वे सोने चाँदी के बर्तन थे। सुल्तान इतना उम्दा और शानदार इंतजाम देख के बहुत खुश हुये।

 उधर सुल्तान के तमाम वजीरों को यह गलत फहमी हो गयी कि ये सारे किसान खूब दौलत कमा रहे हैं और बड़ी शान-शौकत से रहते हैं।एक वजीर सुल्तान से बोला “हुजूर हम लोग तो ये मानते थे कि हमारी जनता में सबसे ज्यादा गरीब तबका किसानों का होता है, लेकिन इनके तो बड़े ठाट-बाट हैं।”

सुल्तान का माथा ठनका वजीर ने सच तो कहा है। वाह! कैसी महंगी उम्दा और शानदार दावत दी थी किसानों ने। सुल्तान ने अपने वजीर से पूछा “इन किसानों की फसल कितने में बिक जाती होगी ?”

“हुजूर ये तो लाखों में खेल रहे हैं। देखा नही हम सबको सोने चांदी के बर्तनों में खाना खिलाया था।”

“इन सबकी तरफ से हमारे खजाने में कितना रूपया दिया जाता है ?” सुल्तान ने सहज रूप से पूछा।

“हुजूर किसानों पर तो दुनिया के आरंभ से आज तक कोई कर नही लगा। उन्हें मजदूर माना जाता है ।” वजीर ने आग में घी डाला।

“तो क्या हुआ ? हम लगायेंगे दो-आब के इन किसानों पर एक कर। अगर थोड़ा थोड़ा भी वसूल करेंगे तो इतने किसानों से बहुत सा रूपया इकठ्ठा हो जायेगा।” सुल्तान ने दो टूक फैसला सुनाया और फरमान लिखाने बैठ गये।

उधर सुल्तान का काफिला दोआब के मैदान पार करता हुआ पठारी इलाके में जा पहुंचा था और इधर गांव-गांव में मुनादी शुरू करा दी गई थी कि हर किसान अपनी फसल की कुल पैदावार का एक फीसदी सरकारी खजाने में जमा करायें।

किसानों को काटो तो खून नहीं। ऐसा तो कभी नहीं हुआ था। सनकी सुल्तान को कौन समझाये कि किसान की आमदनी कोई निश्चित नहीं होती। आसमानी बरसात के भरोसे खेती करते किसान कभी इतना नहीं कमाते कि रोज भरपेट भेाजन कर सकें। वे हमेशा अधपेटे रहते थे।फिर कभी बिटिया की शादी तो कभी माँ-बाप का मृत्यू भोज , किसान पर सौ तरह के खर्चे, सो वह सदा कर्ज से लदा रहता था। ये क्या हो गया बैठे-ठाले ?सुल्तान ने ऐसा गुस्सा किस कारण दिखाया ? ऐसे सवालों से घिरे किसानों के मन में आग सुलगने लगी।

एक दिन पता लगा कि सुल्तान ने उसी वजीर को दो-आब से कर वसूल करने के लिये नियुक्त किया है, जिसने सुल्तान को कर लगाने के लिये उकसाया था।

फिर सुना कि उस वजीर के आदमी किसानों को धमकाते हुए गांव-गांव घूमने लगे। वे बार-बार कहते थे कि अगर कर न दिया तो किसानों के घर की तलाशी लेकर बर्तन-भांडे और मवेशी तक ले जायेंगे।

अब किसानों का गुस्सा सुलग उठा। हर किसान को लग रहा था कि उन्हें बेइज्जत किया जा रहा है।

फिर क्या था, दो-आब के सारे किसानों के जत्थे इकट्ठे होने लगे। उन्होंने पेट काट कर कुछ चंदा इकट्ठा किया और वक्त-जरूरत के लिए भाढे़ के सैनिक भी जुटाने शुरू कर दिये। वे विद्रोह की तैयारी करने लगे।

वजीर पुराना हाकिम था यह देखा तो वह एक रात वह अपने आदमियों के साथ दो-आब से भाग निकला।

जब तक सुल्तान ने पूरे हिन्दुस्तान का चक्कर लगाया, तब तक दो-आब के किसानों की बगावत देश के कई हिस्सों में फैल चुकी थी। महमूद कासिम और बाकी समझदार वजीरों ने सुल्तान को सलाह दी कि यह कर वापस कर लिया जाये। सनकी सुल्तान न माना।

किसान भारी पड़ रहे थे। विद्रोह दबाने में सेना की कई टुकड़ी मारी गई। मेहनत बेकार गई।एक पाई भी कर न मिल पाया, उल्टा नुकसान यह भी हुआ कि जमीन का पुराना लगान भी नहीं मिला उस साल।

सनकी सुल्तान पर दूसरी झक सवार हुई। उसने कर माफ़ कर दिया।

सुल्तान ने इस घटना को एक बुरा सपना मानकर भुला दिया और शांति से राजकाज करने लगे।

सनकी आदमी को बाहर से मुसीबत नहीं बुलाना पड़ती वह खुद पैदा करता है। एक दिन की बात है। खजाने के वजीर ने उन्हें आकर बताया कि खजाने में धन लगातार कम होता जा रहा है, क्योंकि कर कुछ कम जमा हो रहा है, वजीरों के खर्चे ज्यादा हैं ओैर रियासत के सारे सिक्के सोना-चाँदी की धातुओं के बनाये जाते हैं।

सहसा सुल्तान का सनक उठी कि क्यो न सोने- चांदी की जगह सस्ती धातु तांबे के सिक्के चला दिये जायें। सस्ते भी होंगे और उनकी वजह से खजाने में सोना चांदी जैसी बहुमूल्य धातुएं बच जायेगी।

सुल्तान का हुक्म सुना तो खजाने का वजीर चुप साध गया। उन्होंने हां में हां मिला दी। कासिम ने सलाह दी कि सिक्के तो सोने-चांदी के ही होने चाहिए ताकि वे हमारी रियासत से बाहर भी अपनी धातु की कीमत पर चल सकें। फिर, इतने सारे तांबे के सिक्के इतनी जल्दी बनना मुश्किल भी होगा। सुल्तान ने इन सलाहों पर कान नहीं दिया।

फिर क्या था, अगले ही दिन दरबार में एक फरमान जारी हुआ कि अब तांबे के ऐसे सिक्कों से लेन-देन किया जायेगा जो शाही टकसाल में न बनकर किसी ने भी किसी भी सुनार से बनवायें हो। बस उन पर बनवाने वाले का नाम लिखा होना चाहिए। इन्हें तुगलकी सिक्का कहा जायेगा।

जल्दी ही बाजार में तांबे के बने कई तरह के सिक्के दिखाई देने लगे। जिसकी जैसी मर्जी होती वैसे सिक्के बनवा लेता और धड़ल्ले से लेन-देन करने लगता।

कुछ ही दिन बीते थे कि शहर कोतवाल ने एक विदेशी सौदागर को दरबार में पेश किया। सौदागर का जुर्म था कि उसने अपने रेशमी कपड़े दिल्ली के व्यापारियों को तांबे के सिक्कों के बदले में बेचने से साफ मना कर दिया था।

सुल्तान को बहुत गुस्सा आया। एक विदेशी सौदागर की यह मजाल कैसे हुई कि उसने तुगलकी सिक्के लेने से मना कर दिया। न्याय करने के लिए सोदागर को बुलाया गया। सुल्तान ने पूछा “सौदागर, तुम पर यह इल्जाम लगाया गया है कि तुमने हमारे रियासत के तुगलकी सिक्के लेने से इन्कार किया। इस बारे में तुम्हारा क्या कहना है ? ”

सौदागर ने झुककर मोहम्मद तुगलक को सलाम किया और बोला “ हुजूर जान की अमान पाऊं तो अपनी बात कहूं। ”

सुल्तान ने उसी तसल्ली दी कि तुम अपनी सच्चाई कहोगे तो तुम पर कोई जुल्म नहीं होगा।

सौदागर बोला “ हूजूर आपकी रियासत में बहुत तरह के सिक्के चलते हैं इनमें पता ही नहीं लगता कि कौन सा असली है और कौन नकली। इस वजह से मैं इन व्यापारियों से सिक्के नहीं ले रहा हूं। ”

सुल्तान बोला “ हमारे यहां टकसाल बंद करा दी गयी है। हमारे यहां जनता के हर आदमी को छूट है कि मन मर्जी के अपनी पसंद के सिक्के बनवा लें। ”

अपनी हंसी छिपाता हुआ सौदागर बोला “ हुजूर आप तो बड़े आदमी है लेकिन हम जैसे गरीब लोग तो बेमौत मर जायेंगे क्योंकि हमे तो बाहर जाकर ये सिक्के देंने होंगे। वहां तांबे के सिक्के कौन मानेगा? ”

“क्यों भला ?” काजी ने पूछा।

“ इसलिये कि हमारे यहां पूरी रियासत में एक जैसे सिक्के होते है। उन्हें सिर्फ सुल्तान जारी करते है। हम लोग अपने वतन को वापस जायेंगे तो वहां के व्यापारी हिन्दुस्तानी जनता के बने इन तांबों के सिक्कों को किसी भी तरह नहीं मानेंगे। ”

सौदागर ने सच्चाई कही आप तो इजाज़त दीजिए कि “हम लोग अपने वतन को वापस जायें!अपना माल वापस ले जायें।”

अब सुल्तान को होश आया कि अगर इसी तरह विदेशी सौदागर दिल्ली से दूर होते चले गये तो हमारी रियासत में अच्छी तरह की कोई भी चीज नहीं मिलेगी, ना ही मखमली कपड़े, न मलमल और ना ही उम्दा नस्ल के अरब देशों के कद्दावर घोड़े।

फिर नया फरमान जारी हुआ कि सब लोग अपने-अपने तांबे के सिक्के सरकारी खजाने में जमा करायें और बदले में सोने चांदी के सिक्के ले आयें। आगे से उन्हीं सोने चांदी के सिक्के से लेन-देन करें।

फिर तो लूट सी मच गई । बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा। यह नजारा हुआ कि तांबे जैसी धातु के आड़े-तिरछे सिक्कों के बोरे के बोरे भर के लोग खजाने में देते और बदले में चाँदी के सिक्के लिये चले आते। जिसके पास तांबे के पुराने सिक्के न होते, वह नये सिक्के बनवाता और तुरंत ही उन्हें खजाने में जमा कराने चल पड़ता।

धीरे-धीरे सरकारी खजाना खाली होने लगा तो खचांजी ने खजाने के वजीर को बताया। उन्होंने महमूद कासिम से कहा तो उन्होने सुल्तान को जा सुनाया।

सुल्तान अपनी इस सनक पर सिर पीटने लगे। लेकिन अब क्या होना था। कासिम से सुल्तान ने खजाने को भरने का तरीका पूछा। तो कासिम ने सोच-विचार के बाद सलाह दी कि जो-जो लोग तांबे के सिक्के लेकर आये थे उनके सिक्कों पर नाम देखें जायें। सरकार उन सब पर सिक्कों पर अपना नाम दर्ज करने के बदले में छोटा सा कर लगा दे। बहुत सारा धन वापस आ जायेगा।

सुल्तान को यह बात जमी। ऐसा फरमान बना। अब उस जमाने में तो ऐसा नियम था कि राजा बोले सो कानून। सो इस नियम के तहत खजाने में रखे सिक्कों को देख परख कर दरबार से उन सब सिक्कों वालों को बुलाया जाने लगा तो अपने सिक्के ढलवाने वाले सारे लोग खुद ही सुल्तान को कर देने के लिये तैयार हो गये।

सुल्तान की चिंता कुछ कम हुईं।

समय बीतने लगा।

लोग इंतजार में थे कि सुल्तान की नई सनक कब सामने आती है।

मोहम्मद तुगलक ने देखा था कि जबसे वे सुल्तान बने है तबसे उत्तरी दिशा से हर दो चार महीनों मंे नया बखेड़ा खड़ा हो जाता है। हर बार कोई न कोई विदेशी लुटेरा इसी रास्ते हिन्दुस्तान पर हमला करने की नियत से सेना सजाकर आ खड़ा होता है । सबको लगता है कि किसी भी तरह दिल्ली पर कब्जा कर लो पूरा हिन्दुस्तान मुट्ठी में आ जायगा। हिन्दुस्तान की राजधानी दिल्ली इन लुटेरों के रास्ते में सबसे पास पड़ती हैं।

एक दिन सुल्तान अपने महल में हिन्दुस्तान का नक्शा देख रहे थे कि उन्हें एकाएक समझ में आया, कि राजधानी का उत्तरी सीमा के इतने पास में होना खतरनाक है। लुटेरों के हाथों सत्ता न छिने, इसका सबसे बढ़िया रास्ता यही होगा कि राजधानी दिल्ली से हटाकर कहीं दूर ऐसी जगह रखी जाये, जहां विदेशी हमले का कोई खतरा न हो।

फिर वे बेचैनी से नक्श्शा देखने लगे। जल्दी ही उन्हें हिन्दुस्तान के नक्शे के ठीक बीचोंबीच बसा शहर दौलताबाद पसंद आ गया जिसे राजधानी बनाया जा सकता था।

फिर क्या था सुल्तान को सनक सवार हो गई कि जितनी जल्दी हो दिल्ली को छोड़ देना ठीक रहेगा। कासिम ने समझाया कि दौलताबाद में महल आदि बनवाये, सड़क बन जायें उसे राजधानी की तरह बढ़ायें तब राजधानी बदलना ठीक होगा। सुल्तान न माने । उन्होंने पूरी जनता के नाम एक फरमान जारी कर दिया कि दिल्ली का हर वाशिंदा तीन दिन के भीतर दिल्ली छोड़कर दौलताबाद के लिये कूच कर दे। यदि ऐसा न हुआ तो हुक्म न मानने वालो को सजा-ए-मौत दी जायेगी। हां इतनी रियायत की गई कि राह खर्च न रखने वाले खजाने तक आप जो आयेगा उसे राह खर्च सरकार देगी।

वजीर और व्यापारी तो खुशी-खुशी रवाना हो लिये। गरीब जनता में अफरा तफरी मच गई जिनके पास रास्ते का खर्च न था वे सरकारी खजाने से खर्च मांगने आ खड़े हुए और जिनके पास ठीक ठाक पैसा था वे जल्दी ही दौलताबाद की ओर चल पड़े ताकि वहां पहुंच कर अच्छी जगह देख अपने रहने और पेट भरने का ठिकाना पकड़ लें।

सुल्तान के सैनिको को यह जिम्मेदारी सौंपी गयी कि वे पहले तो दिल्ली के हर वाशिंदे को सफर पर रवाना कर दें फिर खुद तेज गति से चलकर दौलताबाद पहुंचे और नई राजधानी के इन्तजाम देखें। सैनिकों ने आव देखा न ताव धड़ाधड़ दिल्ली के लोगों को सामान सहित घरों से खदेडना शुरू कर दिया।

लोग पहले ही परेशान थे । सेना की सख्ती से तो रोना पीटना मच गया। लेकिन न कोई सुनने वाला न कोई न्याय करने वाला सो मजबूर और दुखी लोग जो सवारी मिली उसी पर सामान लाद कर उस अन्जान और अनदेखे शहर दौलताबाद के लिये चल पड़े।

सुल्तान ने अपना पूरा साजो-सामान भेज दिया था वह अकेला सारे नजारे देख रहा था। उसे झल्लाहट हो रही थी कि जनता अपने सुल्तान की दूर दृष्टि को क्यों नहीं समझ रही ? तीसरे दिन की सांझ सुल्तान ने खुद छत पर जाकर चारों ओर नजर फेंकी कि सारी दिल्ली सुनसान और बिना रोशनी के है या अभी भी कोई जिद्दी आदमी बचा है।

सचमुच ही एक जगह पर सुल्तान को रोशनी जलती हुई दिखाई दी तो उसने अपने बाकी बचे सैनिकों को छत पर ले जाकर वह रोशनी दिखाकर कहा- “ये रोशनी जलाकर बैठने वाला कोई भी क्यों न हो, उसे तुरंत ही दौलताबाद के लिये भेज दिया जाये। ”

सैनिकों ने बड़ी मेहनत के बाद वह घर ढूंढा जहां रोशनी जल रही थी। वहां जाकर उन्होंने देखा कि एक परिवार के सारे लोग चले गये है, एक आदमी जिसकी टांग टूटी हुई थी, इस वजह से रूक गया है कि ठीक होते ही वह भी चला जायेगा।

सुल्तान की सनक थी सो सैनिकों ने उस लंगड़े आदमी को एक घोड़े पर जबरन बैठाया और सीधे दौलताबाद जाने को कह दिया रोते‘-कलपते वह आदमी दिल्ली से दौलताबाद जाने वाले रास्ते पर चल दिया।

दिल्ली से दौलताबाद जाने वाला मार्ग अच्छा न था। न तो इस मार्ग पर पानी के लिये कुएं बावड़ियां थी, न ही ठहरने के लिये कोई सराय वगैरह। सुल्तान ने यह भी ध्यान नहीं दिया था कि पहले सड़क बनवा लें, कुएँ खुदवा दें। ताकि इतना बड़ा लाव लश्कर जब इस मार्ग से निकले तो उसे कोई तकलीफ़ न हो।

यात्रियों का यह सफर देखने लायक था। ठण्ड का खराब मौसम, बेकार सड़क और हर तरह की असुविधा झेलते हुए लगातार चलते लोग बहुत थक चुके थे। कई बीमार और बूढ़े लोगों ने रास्ते में ही दम तोड़ दिया। कई लोग पानी के बिना प्यास से मर गये तो कई खाने के बिना भूखे मरें। ...और दौलताबाद तक पहुंचते -पहुंचते एक चौथाई जनता खत्म हो गयी थी।

वजीरों को एक ही महीने में समझ में आ गया कि दौलताबाद में राजधानी जम जाने का मतलब है धरती के स्वर्ग कश्मीर से दूर हो जाना। सारे वजीर गर्मी में कश्मीर जाते थे, जो यहां से हजारों मील दूर था। उधर व्यापारियों को महसूस हुआ कि विदेशी सौदागरों के लिये नई राजधानी बहुत दूर पड़ेगी सो यहां बड़ा कारोबार कर पाना कतई संभव नहीं होगा।

जितना सुल्तान माहौल जमाने की कोशिश करते, वजीर और व्यापारी वर्ग उतनी ही दिक्कतें खड़ी कर देते। मुंह पर तो वे लोग हां में हां मिलाते लेकिन पीठ पीछे अफवाहें फेलाते, लोगों को भड़काते।

“ सुल्तान सनकी हो गया है”

“ सुल्तान पागल हो गया है ”

“ दौलताबाद में क़यामत आने वाली है ”

“ दौलताबाद पर दक्खन के लुटेरों का हमला होने वाला है ”

ऐसी अफवाहें जनता के बीच रोज उड़ाई जातीं। जरा सी समस्या को बहुत बड़ी आफत बनाकर सुल्तान को बताया जाता।

आखिरकार सुल्तान का सनकीपन फिर उजागर हुआ । उन्होंने कासिम को बुलाया और पूछा “महमूद तुम बताओ कि हम अपने फैसले को बदलकर वापस दिल्ली में ही राजधानी कर लें तो कैसा रहेगा ?”

कासिम ने सलाह दी कि “ हुजूर, नई जगह पर जमने में साल-दो साल लगते है। इसलिए यही ठहरिये।” एक पल सब्र कर हिचकते हुए वह बोला “ फिर हुजूर एक बात और बुरी होगी कि फैसला भी आप वापस लेगें तो जनता में आपकी बड़ी बदनामी होगी। ”

“ मुझे किसी की परवाह नहीं है !” हरेक सनकी व्यक्ति की तरह सुल्तान ने कासिम की सलाह पर ध्यान नहीं दिया।

फिर जैसा कि हमेशा होता था, सुल्तान ने अपना फरमान वापस लिया और दौलताबाद में यह मुनादी करा दी गई कि सारे दिल्लीवासी अपने पुराने शहर को वापस चल दें। फिर से दिल्ली राजधानी बनाई जा रही है।

जनता को काटो तो खून नहीं। वे सुलतान से गुहार करने गये।

लेकिन कौन किसकी सुनता । लोग पागल की तरह दिल्ली की तरफ दौड़ पड़े। इस सफर में भी हजारों लोग मरे, सैकड़ो को डाकुओं ने लूटा और दर्जनों लोग रास्ते के गांवों में दुबक कर छिप गये। दिल्ली पहुंचते-पहुंचते फिर एक चौथाई लोग कम हो गये थे।

अचानक एक दिन सुल्तान के इन्तकाल की खबर राजधानी में चारों ओर फैल गई। राजधानी में कई तरह अफवाहें थीं, ...कोई कहता कि वजीरों की साजिस से उन्हें मारा गया ...तो कोई कहता था कि वे बीमारी से खत्म हुए, ...तो कोई कहता था कि अपनी असफलताओं से दुखी होकर उन्होंने खुद जहर पी लिया था। किसी ने दावा किया कि पागल हो गये थे अपने आप मर गये।

---जल्दी ही एक नया सुलतान गद्दी पर बैठ गया।

दिल्ली की जनता को सनकी सुलतान से मुक्ति मिली।

                                         


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