समय
समय
मम्मा देखो चाँद दिखने लगा। कितना सुंदर गोल- गोल दिख रहा है। जेवीजी पार्क के बाहर बने फुटपाथ एरिया के पास एक कार आकर रूकी और गेट खोल कर बाहर निकलते ही एक पांच–सात साल का बच्चा पार्क के पार चाँददेखता हुआ अपनी माँ से कह रहा था। गोधूली बेला समाप्त हो रही थी। हल्का अंधेरा फैलने वाला था तभी पूनम का चाँदअपनी पूर्ण आभा के साथ निकला और हल्का उजास फैल गया। ठण्ढी हवा भी धीरे- धीरे बह रही थी। सितंबर के उमस वाले मौसम में यह नजारा और ये मीठी सी हवा मन प्रफुल्ल कर देने के लिए काफी थी।
बाहर आकर बच्चे की माँ भी इस मौसम के मोहपाश में बंध गई। बहुत सही समय पर आयें हैं बेटे हम लोग देखो चांदनी का उजाला फैल गया है। हवा कितनी ठंडी है। देखो पूर्ण चंद्र कितना सुंदर दिख रहा है न। हम पार्क के अंदर जाएंगे तो और भी सुंदर दिखेगा।
हां मम्मा आज रात हमलोगा घर नहीं जाएंगे। मैं तो झूले पर भी नहीं बैठूंगा, हमलोग सिर्फ चाँद देखेंगे, कहता हुआ वह चारदिवारी के बीच में बने खांचे से चाँदका निहारने लगा।
घर तो जाना पड़ेगा बेटा, रात दस बजे के बाद पार्क बंद हो जाएगा। पर हमलोग तीन घंटे घूम सकते हैं।
वे बेटे को समझाने लगीं।
मम्मा ये चाँद क्या पेड के पीछे से निकलता है? उसने चाँद पर नजर गड़ाए गड़ाए ही पूछा
नही, चाँद तो आसमान में ही रहता है। दिन में सूरज से डरकर छुपता है। शाम को जब सूरज अपने घर चला जाता है तो चाँदजल्दी से बाहर आ जाता है। इसिलए ही तो रात में घूमने में मजा आता है। चाँद कैसी ठंडी सी रोशनी देता है। अब पार्क के अंदर चलो, बेटा टिकट भी लेनी है।
रूक जाओ मम्मा बस पांच मिनट देखो न चाँद कितना चमक रहा है। इसके बगल में जो पेड है न वह कितना सुंदर डांस कर रहा है।
मां- बेटे को चाँदनिहारते पंद्रह मिनट से अधिक हो गए थे। बच्चे की माँ उसे जबरदस्ती लेकर टिकट काउंटर तक ले गई।
इधर पुटपाथ के पास ही एक अन्य माँ अपनी पोटली संभालती पांच साल की बच्ची का हाथा पकड़े तेजी से आ रही थी। तब तक बच्ची ने भी चाँद देख लिया।
माँ देखें चंदा मामा, देखो- देखो कितने प्यारे निकले हैं आज, उसने आकाश की ओर उंगली दिखा कर कहा।
नासपीटी इसी से तो कह रही हूं अंधेरा हो गया जल्दी चल समय कितना खराब है। अभी दो किमी से कम नहीं होगा हमारा घर। तेरी चाल से चलकर आधे घंटे लग जाएंगे। निगोड़ा चाँद अभी ही निकल पड़ा। मौसम ही खराब हो चला है। गर्मीयों में तो कम से कम आधा घंटा और रूकता। पोटली में आज के कमाए दो सौ रुपए हैं, यह चावल, नमक है। अंधेरे का फायदा उठा कर किसी ने छिन- झपट लिया तो करूंगी। वह सोच ही रही थी कि बच्ची ने हाथ छुड़ा लिया। देख न माँ, कितना सुंदर चांद, रूक जा पहले देख ले तब चलेंगे।
तभी एक झन्नाटेदार चाटा उसकी गाल में पड़ा, जमाना इतना खराब है कि तुझे घर में अकेली छोड़कर भी काम पर नहीं जा सकती। तब से कह रही हूँ अंधेरा हुआ। दौड़ लगा, तो चाँद दिख रहा है। कितना खराब समय है यह देखना कब सीखेगी, करमजली।
अगले ही क्षण बच्ची के कदम तेज हो गए, उसे शायद समय की खराबी समझ में आ गई।
