SNEHA NALAWADE

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सच्चा प्रेम...

सच्चा प्रेम...

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आखिर ये सच्चा प्रेम होता क्या है ??

क्या यह सिर्फ दो लोगो में ही होता है - प्रियकर और प्रेयसी ??

बिलकुल भी नहीं जरूरी नहीं है कि वे ही दो लोग हो अक्सर खुश रिश्ते ऐसे होते जिनका अटूट रिश्ता होना ही सब कुछ होता है।

मेरे लिए भी कुछ ऐसा ही है जी ठीक ही पढ़ा आपने।

मेरे लिए हर वो इंसान महत्वपूर्ण है जिनकी वजह से मैं आज जिंदगी में बहुत कुछ हासिल कर पाई हूँ और जल्दी ही अपने सपने को पूरा होते देखना चाहती हूँ। यह कहानी खुद मेरी है इसमे लिखा हुआ हर शब्द बिलकुल सच है।

मैं पुणा में अपनी माँ और भाई के साथ रहती हूँ। पिताजी आर्मी में है तो अक्सर वो तीन महीने की छुट्टी के बाद ही आते हैं। पिछले बीस साल हो गए हम यहाँ रह रहे है अब तो यकीन भी नहीं होता वक्त कितने जल्दी बीत गया। पर हाँ सच है वक्त कितने जल्दी बीत गया। दसवीं में जब मैं थी तब मैं गणित विषय में अपयश हुई थी जिसकी सजा मैने दो साल घर में बैठकर गुजारी। सबसे बुरा वक्त मेरी जिंदगी का वो था, आज भी जब कोई उसके बारे में बात करता है तो आँखें भर आती है इतना आसान थोड़ी ना होता है !

मेरे मन में तो जैसे डर ही बैठ गया था। गणित से संबंधित कोई भी सवाल हो या कुछ भी मैं बेचैन हो जाती थी, उसी दरम्यान मेरी दादी बीमार पड़ गई कोई दवा इलाज कुछ भी असर नहीं कर पाई क्या हालात थे वो।।

दसवीं मैने दूसरे बोर्ड और स्कूल से किया। आखिरकार मैं पास हो गई सच में बेहद खुशी हुई। आगे की पढ़ाई के बारे में घर वाले बातचीत करने लगे पिताजी की काफी इच्छा थी की मैं साइंस शाखा में प्रवेश करूँ पर गणित के डर की वजह से मैने बात नहीं मानी और वाणिज्य शाखा में प्रवेश लिया। बिलकुल भी आसान नहीं था पर क्या कर सकती थी मैं ?? सब कुछ चुपचाप अंदर ही खुद को खुश रखने की कोशिश कर रही थी मैं। बारहवीं की परीक्षा दी और मैं अच्छे अंकों से पास हो गई।

फिर आगे पढ़ाई की तैयारी। ग्रेजुएट के लिए प्रवेश लिया। कॉलेज की जिंदगी के बारे में सुना था पर वक्त था उसे जीने का.! कुछ वक्त बीतने के बाद मेरी मुलाका अर्थशास्त्र की मैम से बात हुई . अर्चना आहेर ! पहली ही नजर में उन्होने मुझे इतने सवाल किए थे की मैं समझ नहीं पाई क्या चल रहा है की आखिर वो ऐसा क्यूँ कर रही है ?? उसके बाद मैं जिस भी प्रतियोगिता में होती थी तब वो भी वहां होती थी और मुझे कुछ भी समझ में नहीं आता था वक्त के साथ साथ मैं उन्हे जानने लगी। वो क्या कहती है क्यूँ कहती है उनकी सोच उनका स्वभाव हर एक चीज मुझे काफी पसंद आता था धीरे धीरे मेरे उनके साथ को रिश्ता कुछ अलग ही बन गया था, की मैं उनमें मेरी माँ ही देखती है क्यूँ ना ऐसा होता वो है ही वैसी । वक्त के साथ साथ मेरा उनके साथ लगाव बढ़ता चला गया। ऐसा एक भी दिन नहीं जाता जब मेरी उनसे बात न होती, उनसे बात न हुई तो बेचैनी होती उनकी उम्मीदें मुझसे बढ़ने लगी मैने भी हर कोशिश की उनके उम्मीद पर खरी उतरने की और जब कभी ऐसा न हो पाया तब बड़े ही प्यार से समझ के लिया।

मेरा उन पर नाराज़ होना उनका मुझे समझ कर लेना मेरा उनके साथ घंटो बातें करना उनका मुझे छोटी छोटी बातें समझना उनकी हर बात को मैं मानती हूँ ऐसा कोई बात नहीं की उन होने मुझे कहा है और मैने किया नहीं है।

देखते ही देखते तीन साल कब बीत गए पता नहीं चला ना मुझे और ना ही उन्हे पर उनके साथ का रिश्ता पूरी जिंदगी भर का है

जहाँ पर नज़रों से बातें होती है।

मिली तुमसे निगाहें तो मेरा चेहरा नजर आता...


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