Mukta Sahay

Others


4.0  

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साथी ऐसे भी और वैसे भी -2

साथी ऐसे भी और वैसे भी -2

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आज मुझे आध्यतम सेंटर से वापस आए दो दिन हो गए थे। वहाँ जा कर जिस शांति और सुकून का अनुभव हुआ था वह अब भी मुझ महसूस हो रहा था। साथ में माँ से मिली खबर कि उनके होने वाले जमाई बाबू “रोहन”  मुझ से मिलने यहाँ आ रहे हैं, मुझ में ऊर्जा का संचार कर रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे मेरे मन की व्यथा रोहन तक पहुँच रही थी और शायद वही उन्हें यहाँ तक खींची ला रही है। 

मेरी छुट्टी के अभी तीन दिन और बाक़ी थे और मैं इन तीन दिनों में क्या क्या करूँगी की योजना ही बना रही थी कि फ़ोन की घंटी बजी। मैं थोड़ा झल्लाई, कौन है जो चैन से रहने भी नहीं देता। फ़ोन उठाया तो मन ख़ुशी से झूम उठा। रोहन का फ़ोन था जिसका इंतज़ार मैं तब से कर रही हूँ जब से माँ ने इनके आने के बारे में बताया था। मेरी धड़कन बढ़ सी गई थी। फ़ोन उठाया मैंने, उधर से आवाज़ आई “नैना, मैं रोहन” । रोहन की आवाज़ सुन कर मन नाचने को हुआ और मुझे ध्यान ही नहीं रहा की कुछ जवाब भी देना है। उधर से फिर आवाज़ आई नैना! अपनी ख़ुशी से बाहर आ कर मैंने कहा हाँ, रोहन आप कैसे हैं? रोहन ने कहा, तुम्हें तो पता होगा की मैं वहाँ आने वाला हूँ। मेरे हाँ कहने के पहले ही उन्होंने आगे कहा, शनिवार सुबह की फ़्लाइट से मैं आ रहा हूँ और दोपहर तक पहुँच जाऊँगा। मेरे ऑफ़िस का गेस्ट हाउस है वहीं रुकूँगा। नैना आपसे शनिवार की शाम मुलाक़ात हो जाएगी, अगर आपके कोई प्लान ना हो तो। मैं तो कब से इंतज़ार कर रही थी, अगर कुछ काम होता तो भी टाल देती। मैंने कहा, हाँ ! ज़रूर। आप इतनी दूर से आ रहे हैं तो आपसे मिलना सारे कामों से ज़रूरी है। रोहन ने कहा, अच्छा फिर शनिवार को मिलते हैं। हम दोनो ने फ़ोन रख दिया। 

मैं थोड़े कौतूहल में आ गई और कमरे में चहल क़दमी करने लगी। अब मेरे में वे सारे प्रश्न आने लगे जिनके जवाब मैं समझ नहीं पा रही थी। उन सब में सबसे महत्वपूर्ण सवाल था “ क्यों रोहन ने सब कुछ जानते हुए शादी के लिए हाँ कर दी?” उनके आने की बात पर दूसरा सवाल जो बार-बार मन में उठ रहा था कि क्यों वह इतनी दूर मुझसे मिलने आ रहे हैं। ख़ैर एक दिन का इंतज़ार फिर शायद सारे सवालों के जवाब मिल जाएँगे। आम लड़कियों के भाँति आईने के सामने खड़ी हो कर खुद को पूरी बारीकी के साथ निहारा और पार्लर जाने की ज़रूरत का आकलन किया। अब बारी थी कपड़ों की तो अलमिरा खोल खड़ी हो गई और उलझन में घिर गई कि इसे पहनूँ या उसे। काफ़ी मेहनत के बाद कपड़े और गहनों का भी चुनाव हो गया। यह सब करते करते शाम हो गई। 

अभी मैं सोफ़े पर आकर बैठी ही थी कि बाहर से बच्चों की आवाज़ आई “ नैना दीदी हमारी गेंद आपके बालकोनी में जा गिरी है, उसे वापस कर दें।" बालकोनी में आई और बच्चों को उनकी गेंद वापस कर वहीं बालकोनी में ही बैठ गई। ढलती हुई शाम, सूरज की सुस्त लालिमा, हल्की ठंडी मंद गति से चलती हवा, बच्चों की खिलखिलाती हँसी और मासूम झगड़े की आवाज़ों के बीच मेरी यादों का पिटारा फिर खुल गया था। मुझे वह सब याद आ रहा था जब मैंने, अजय और हमारे पाँच और दोस्तों ने नौकरी शुरू की थी तब हम सातों के बीच भी ऐसे ही हँसी का दौर चला करता था और झूठमूठ के झगड़े हुआ करते थे। बहुत ही ख़ुशनुमा थे वे दिन। इन्हीं दिनों ने अजय जैसा भी दोस्त दिया था जिसका साथ बहुत ही ख़ास था मेरे लिए और इसी ख़ास साथी ने मेरी ज़िंदगी को घायल करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। पूरानी यादों में उलझी मुझे पता ही नहीं चला की कब शाम से रात हो गई। 

शनिवार की सुबह है। सुबह जल्दी ही उठ गई और पूरे घर पर नज़र दौड़ाई। शिष्टाचार वश रोहन को घर आने को तो कहना ही होगा और अगर वह मान गया तो घर भी इस हाल में होना चाहिए की उनकी आवभगत कि जा सके। कल पूरे दिन लग कर घर का सब कूच सही किया था। नए फूल लगाए थे गुलदस्तों में, सारी लाइटें सही करीं थी, पर्दे, कुशन, चादर सभी चीजें सही करी थी मैंने। इस मुआयने के बाद मैंने खुद को देखा। जल्दी जल्दी तैयार होने लगी। यूँ तो शाम होने में अभी बहुत समय था और फिर जगह – समय तो रोहन ने पहुँचने के बाद बताने की कही थी। मैंने पाया कि मैं रोहन से मिलने के लिए बहुत उत्साहित हो रही हूँ। एक तूफ़ान के बाद जीवन के नए अध्याय के शुरुआत की तैयारी थी शायद इसलिए मेरा ये हाल हुआ जा रहा था। 

रोहन के आने की तैयारियों का मुआयना ही चल रहा था की रोहन ने फ़ोन करके बताया की वह पहुँच गया है है और गाड़ी ले कर अपने गेस्ट हाउस जा रहा है। फिर मिलने की जगह और समय तय किया हम दोनो ने। शहर के बारे में जैसी जानकारी रोहन के पास थी उससे लगा वह यहाँ रह चुका है। उसने जिस कॉफ़ी शॉप को चुना था वह कोई बड़ी और नामी जगह नहीं थी लेकिन अपनी कॉफी के अनूठे स्वाद के लिए स्थानीय लोगों में खूब जानी जाती है। बाज़ार और भीड़-भाड़ वाली सड़क से दूर एक पतली सी गली में स्थित इस दुकान की अपनी ही ख़ासियत है। छोटी -छोटी बिज़्नेस मीटिंग करने वालों की यह ख़ासी पसंदीदा जगह है। इस शॉप की संरचना छोटी मीटिंग के हिसाब से है कि एक मीटिंग करने वाले को दूसरे मीटिंग करने वाले से कोई परेशानी ना हो और गोपनीयता बनी रहे। सप्ताह के पाँच दिन तो यहाँ पहले से टेबल बुक कराना पड़ता है क्योंकि लंबी क़तार होती है। शनिवार और रविवार को अमूमन ख़ाली ही रहता है। आज शनिवार है तो भीड़ वाली प्रमुख जगहों से विपरीत ये जगह ख़ाली होगी और बातें करने के लिए भी उपयुक्त है, इतनी गहरी जानकारी तो सिर्फ़ शहर को अच्छे से जानने वाले के पास ही हो सकती है।

तय समय पर मैं पहुँच गई। कॉफ़ी शॉप से थोड़ा पहले ही रुक गई और रोहन को फ़ोन किया पता करने के लिए की वह पहुँचे या नहीं। उन्होंने बताया बस पहुँचने ही वाले है। मैं वहीं रुक गई अपनी नज़र शॉप पर आने वाले लोगों पर जमाए। रोहन को आता देख मैं भी आगे बढ़ी। शॉप के दरवाज़े पर ही रोहन से मिल ली। दोनो तरफ़ से हल्की मुस्कान के साथ अभिवादन हुआ और हम दोनो अंदर की ओर बढ़ चले। रोहन ने पहले से ही टेबल बुक कर रखी थी उसका नम्बर मालूम कर हम वहाँ बैठ गए। अभिवादन के बाद हम दोनो के बीच अभी तक कोई बात नहीं हुई थी। 

हमारे बैठते ही वेटर ने ग्लास में पानी डाला और मेन्यू की ओर इशारा कर चला गया। रोहन ने पानी का ग्लास उठाया। बात की शुरुआत के लिए मैंने वही घिसा पिटा सवाल पूछा लिया सफ़र कैसा रहा ? “बढ़िया, समय से था” रोहन ने कहा। प्रारम्भिक औपचारिकता पूरी होते होते हम दोनो के बीच बात-चीत का सामान्य सिलसिला शुरू हो गया था। साथ ही कॉफी भी आ गई थी हमारी। परिवार, शहर, काम- नौकरी इत्यादि सभी की चर्चा हुई। मैं कौतूहल में थी कि रोहन कब उस बात पर आएँगे जिसके लिए वह यहाँ तक आए है ताकि मैं भी अपने सवाल पूछ सकूँ। मुझे लगा कहीं मुझे ही तो नहीं शुरू करना चाहिए क्योंकि अब तो कॉफी भी खत्म हो गई है। वेटर के ख़ाली कप उठा कर ले जाने के साथ ही रोहन ने कहा तुम सोच रही होगी कि क्या मैं इन विषयों पर बातें करने यहाँ आया हूँ और हल्की मुस्कान के साथ अपने दोनो हाथ टेबल पर रख कर उसने गहरी साँस ली। मैंने भी अपनी धड़कनों को सम्भाला। शायद रोहन को भी अपने आप को संयत करने में समय लग रहा था इसलिए इतनी देर तक इधर उधर की बातें होती रहीं थी हमारे बीच । 

रोहन ने कहा, तुम सोच रही होगी कि सारी बातें जान कर भी मैंने क्यों हाँ की इस शादी के लिए। मैंने मन को सुकून मिला कि बिना पूछे ही जवाब मिल जाएगा क्योंकि ये सवाल करना मेरे लिए भी बहुत कठिन होता। मैं अपनी हृदय गति को क़ाबू में करने की पूरी कोशिश कर रोहन की बातें सुन रही थी। आगे कहा रोहन ने, उस दिन तुमने दृढ़ता से अपने बारे में सब कुछ बता दिया था लेकिन मैं कुछ कह नहीं पाया। तुमने भी मुझसे मेरे बारे में कुछ भी नहीं पूछा। शायद उस समय तुम पर तुम्हारी अपनी ज़िंदगी की समस्या हावी रही थी कि तुम मेरे बारे में जानकारी लेने को सोच ही नहीं सकी थी या शायद तुम्हें लगा होगा कि तुम्हारे और अजय की सच्चाई जान कर मैं मना कर दूँगा या फिर तुम बिना मेरे बारे में जाने ही मुझ पर भरोसा कर बैठी थी की मैं सही हूँ या शायद फिर तुम अपने परिवार की सोच कर किसी के भी साथ बंधने को तैयार थी। वजह इनमें से कुछ भी रहा हो लेकिन मैं ऐसे बोझ ले कर अपने रिश्ते की शुरुआत नहीं करना चाहता था। मैं अपने बारे में तुम्हें बताना चाहता था। 

रोहन बिना रुके बोले जा रहे थे। आज से पाँच साल पहले इसी शहर से मैंने अपनी पहली नौकरी शुरू की थी, बहुत सारे सुनहरे सपनों के साथ। उस समय ज़िंदगी में आगे बढ़ने का ऐसा जोश था की हर काम को एक चुनौती के रूप में पूरा करता था। उस दौरान मेरी एक सम्मेलन में मेरी मुलाक़ात सुमन से हुई। वह मेरी कम्पनी के साथ काम करने वाली दूसरी कम्पनी से थी। आत्मविश्वास से भरा उसका व्यक्तित्व मुझे उसकी ओर आकर्षित किया। पहली बार मैं किसी लड़की की ओर ऐसे मोहित हुआ था। पूरे समय मैं उसे निहारता रहा। सम्मेलन के बाद रात्रिभोज में उसके बारे में जानने का मौक़ा मिला। देर तक हम दोनो बात करते रहे। उसके पिताजी की ही वह कम्पनी थी जिसके साथ मेरी कम्पनी काम करती थी। इसके बाद कम्पनी के काम से उससे फिर से मिलना हुआ। अब मैं उसकी कम्पनी में मीटिंग के लिए जाने का मौक़ा बनाता या तो उसे अपने यहाँ मीटिंग के बहाने बुलाता। एक समय ऐसा भी आया की अब हमें मिलने के लिए किसी मीटिंग की ज़रूरत नहीं होती। ऑफिस के बाद कभी यहाँ कभी वहाँ हम मिला करने लगे। लगभग हर दिन ही हम मिलते थे। दोनो ही इंतज़ार करते थे शाम की इस मुलाक़ात का। धीरे धीरे हम एक दूसरे के घर भी जाने लगे। मेरा तो एक कमरे का फ़्लैट था जिसमें मैं अकेला रहता था जबकि उसका तो बड़ा सा बंगला था। जब एकांत में मिलने की इच्छा होती तो मेरे फ़्लैट में आ जाते और जब कुछ ख़ास होता तो उसके बंगले पर भरे-पूरे परिवार के साथ समय बिताते हम दोनो। 

कई बार उसकी शान-ओ- शौक़त देखकर लगता था की शायद हम दोनो कभी भी मिल ही नहीं सकते लेकिन सुमन की सादगी और उसके परिवार का अपनापन मुझे कहता तुम ग़लत हो। 

उस दिन दोपहर से ही धूल भरी हवा चल रही थी। शाम को भी जब हम ऑफ़िस के बाद मिले तो मौसम में कोई सुधार नहीं हुआ था। मैंने सुमन को कहा भी कि आज मौसम कुछ बिगड़ा सा है सो आज तुम घर चली जाओ कल मैं तुम्हारे ऑफ़िस आ जाऊँगा। पर वह नहीं मानी। कुछ अनमनी सी थी वह उस दिन। हम दोनो ऑफ़िस से निकल कर वह पास वाले मेन रोड पर मिले थे। धूल बहुत ज़्यादा उड़ रही थी इसलिए हम दोनो यहीं इसी कॉफी शॉप में आ गए। शाम हो गई थी और ऊपर से ख़राब मौसम सो हमें आराम से जगह मिल गई। हमने कॉफी ऑर्डर की और बातें करने लगे। तब तक बारिश भी शुरू हो गई थी। बहुत ही तेज मूसलाधार बारिश थी। कॉफी का कप हाथ में लेते ही सुमन थोड़ी गम्भीर हो गई। उसने बताया उसका रिश्ता तय कर दिया गया है। जिससे रिश्ता तय हुआ है उसके पिता और सुमन के पिता पूराने मित्र हैं। दुबई में उनका बहुत बड़ा व्यवसाय है और यह उनका अकेला बेटा है। सुमन ने अपने माता-पिता को जब मना कर मेरे साथ शादी की बात करी तो उन्होंने मना कर दिया। सुमन अपने माता-पिता और परिवार के रज़ामंदी से ही कुछ भी निर्णय लेना चाहती थी। उसने मुझे अपने पिता से मिलने को कहा। सुमन की बातें सुन कर ऐसा लगा जैसे आज की ये आँधी हमारे जीवन में भी ऐसी ही आँधी ले कर आई है। बाहर हो रही बारिश के जैसे ही बारिश आज मेरे और सुमन के आँखों से हो रही थी। थोडा समय लगा हम दोनो ने स्वयं को सम्भाल और अपने अपने घरों को चले गए । ये रात बड़ी ही लम्बी थी। आँखों में नींद नहीं थी और मन में जानलेवा बेचैनी भारी थी। 

अगले दिन मैं सुमन के पिता से मिला। मेरे और सुमन के रिश्ते से जुड़े बहुत सारे सवाल-जवाब, चर्चा, वाद-प्रतिवाद, मान -मनुहार,याचना के बाद भी सुमन के पिता नहीं माने। इधर सुमन अपने माता-पिता की सहमति से इतर कुछ नहीं करना चाहती थी और माता-पिता की इच्छा के लिए अपनी चाहत का समर्पण कर दिया। उसने यह भी नही सोचा कि उसके इस निर्णय में दो लोग की ज़िंदगी शामिल है। उसके इस निर्णय में मेरा तो सब कुछ लुट गया। इसके बाद हम फिर कभी नहीं मिले। कुछ ही दिनो में उसकी सगाई हो गई और फिर शादी। वह दुबई चली गई। मैंने भी शहर छोड़ने का निर्णय ले लिया। अच्छी नौकरी मिलते ही मैं वापस चला गया। रोहन थोड़ा चुप से हो गए शायद पुरानी बातें याद करने से छिपे हुए दुःख हरे हो गए थे। मैं भी व्यथित हो गई थी रोहन की पीड़ा को सुन कर। 

हम दोनो की मनोस्थिति ऐसी थी कि हम दोनो एक दूसरे की आँखो में देखने हर नाकाम कोशिश कर रहे थे लेकिन सफल नहीं हो रहे थे। जब उनकी आँखें मुझे देखती तो मेरा सिर नीचे झुक जाता और जब मेरी नज़र उनसे मिलती तो वह नज़रें नीची कर लेते। हम दोनो को डर था कि कहीं नज़रें मिलते ही भावनायें ना बह निकले।   

रोहन ने अपनी पीड़ा और भावनाओं बटोर फिर शुरू किया। इस घटना के बाद घर से शादी के लिए बहुत दवाब बनाने लगा लेकिन मेरी शादी की कोई इच्छा ही नहीं थी और ना ही किसी लड़की के लिए कोई भावना ही उठती थी । जब तुम्हारे बारे में घर में बात चली तो मैंने तुमसे मिलने की बात ये सोच कर कही थी की तुम्हारे घरवाले या तुम में से कोई मना कर देगा। पर देखो किसी ने भी इस बात के लिए मना नहीं किया और तुम भी दौड़ी आई थी। हम दोनो इस बात पर आहिस्ते से हँस दिए। माहौल का भारीपन थोड़ा कम गया इस बात पर। रोहन ने अपनी बात आगे कही, जब मिलने को आए थे तब मैं सोच कर आया था की तुम्हें सबकुछ बता दूँगा। एक लड़की कभी पसंद नहीं करेगी की उसका होने वाला पति किसी और को चाहता था और स्त्री सहज जलन से तुम मना कर दोगी तो मेरी जान अपने घरवालों से कुछ दिन के लिए बच जाएगी। पर उस अजय को भी तभी मिलना था उस पुरुष प्रधान अहं के साथ और सारी आग उगलनी थी। मैंने भी चुप नहीं रहा, तुमसे आ कर पूछ लिया। जब सारी बातें पता लगी तो मैंने सोचा की मुझे ना करने की वजह तो मिल ही गई है अब मैं अपना पिटारा क्यों खोलूँ तुम्हारे साथ। 

घर आकर जब माँ ने मेरा निर्णय पूछा तो मैंने ना कर दिया। तब घर में सभी करण पूछने लगे। माँ भी कहने लगी इतनी अच्छी लड़की है क्या कमी है। चाचीजी ने भी तुम्हें बचपन से देखा है घर-परिवार सब बढ़िया है, लड़की भी सुसंस्कृत है फिर तू ना क्यों कर रहा है। मैं तुम्हारी और अजय के बारे में बताना तो चाहता था पर पता नहीं क्यों बता नहीं पा रहा था। मैंने किसी तरह सभी से जान छुड़ाई और छत पर चला गया। 

मैंने यह अहसास किया कि मेरा झुकाव तुम्हारी तरफ़ हो गया है। सुमन को पहली बार देख कर जैसा लगा था कुछ वैसा ही आभास तुमसे बात करके होने लगा था। जिस सच्चाई से तुमने अपनी पिछली सारी बातें साझा करी और जिस दृढ़ता से आगे बढ़ने का हौसला दिखाया, वह कही ना कहीं मेरे दिल को बहुत ही गहराई से भा गया। शायद यही कारण रहा होगा जो मैं सभी को अपने ना की वजह नहीं बता पा रहा था। अब मेरी भी सारी सच्चाई तुम्हारे सामने है और इसके बाद के निर्णय की बारी तुम्हारी है। रोहन की नज़रें अब मुझे देख रही थी और मैं अपनी साँसों को रोके सोच रही थी की क्या कहूँ और ना कहूँ। रोहन ने तो अपने प्रेम का इज़हार भी कर दिया था और मुझसे इसका जवाब भी चाहता था। मुझ में तो इतनी भी हिम्मत नहीं हो रही थी की मैं अपने नज़रें रोहन से मिलाऊँ और बाद में जवाब देने की बात कहूँ। बहुत ही लम्बी होती जा रही थी हमारे बीच की खामोशी।

मेरे लिए यह पहला अनुभव था जब किसी ने अपना प्रणय-प्रस्ताव मेरे सामने रखा हो। अब तो मेरे द्वारा पूछे जाने वाले सवाल अपना वजूद ही खो दिए थे उस सवाल के सामने जिसका जवाब मुझे देना है। इस जवाब का देना बहुत ही कठिन था क्योंकि ना मेरी धड़कन साथ दे रही थी, ना ही मेरे सुर्ख़ होते गाल और ना ही मेरे शिथिल शीतल होते होठ। मैं बड़ी ही असमंजस में पड़ी थी की तभी मेरे कंधे पर किसी ने हाथ रखा। मैं झटके से अपने ताने-बाने से बाहर आई। 

रोहन कब उठ कर मेरे पीछे खड़े हो गए मुझे पता ही नहीं चला। उन्होंने कहा चलो बाहर चलते हैं, मौसम बहुत ही अच्छा हो रहा है और इस शहर की एक और छुपी हुई खासियत से तुम्हें मिलवाता हूँ। मुझे विश्वास है तुम वहाँ कभी नहीं गई होगी। मैंने खुद को सम्भाला और खड़ी होते हुए हौले से पूछा कहाँ जिसका मुझे कोई जवाब नहीं मिला। टेबल से उठते ही रोहन ने मेरे हाथों को बड़े ही विश्वास और अधिकार से अपने हाथों में लिया था, बिना ये जाने की मेरा जवाब क्या है। और मैं, उसके इस बात का विरोध किए बिना साथ चल पड़ी।

वैसे तो मेरे बहुत से दोस्त लड़के हैं, अजय भी था लेकिन आज रोहन के स्पर्श से जो अहसास हुआ वह कभी भी पहले नहीं हुआ था। शादी के लिए तो मेरी हाँ थी लेकिन क्या उसका अभी दिया गया प्रस्ताव मैंने स्वीकार कर लिया था, क्या ये सारे अहसास की वजह मेरी स्वीकृति है। मैं सोंच ही रही थी की इन्हें कैसे पता चला की मैं हाँ कहने वाली हूँ, क्या मैंने हाँ बोल दिया था, मैं अपनी ही उधेड़बुन में थी कि रोहन ने कॉफी शॉप से निकलते हुए कहा, कल सुबह फिर मिलते हैं यहीं, इसी कॉफी शॉप में। 

इन अदभूत, अपरिचित अहसासों के साथ मैं तो बस वही कर रही थी जो रोहन कह रहे थे। मेरे शब्द सूखे पड़े थे और मुझे अभी अपनी सुध ही नहीं थी, वास्तविकता तो ये थी कि मैं रोहन के अनुसार ही बहती जा रही थी, उसकी ही वेग में।  

रोहन मुझे ले कर एक खूबसूरत छोटी सी झील के पास ले आए थे। झील की सीढ़ियों और पास के खंभों को देख ऐसा लगता था कि झील बहुत पुरानी है, राजाओं के समय की लेकिन पड़ोस के लोगों को छोड़ कोई यहाँ नहीं आता। हम दोनो वहीं बैठ गए। मेरा हाथ अब भी रोहन की हाथ में था। ना उन्होंने उसे ढीला होने दिया और ना ही मैंने छुड़ाना चाहा। हल्की चाँदनी, झिलमिलाते तारे और झील के पानी में तरंगे बनाती मध्यम हवा। हम दोनो देर तक बैठे रहे। रोहन बहुत से बातें, इस शहर से जुड़ी, बताते रहे और मैं सुनती रही। अब झील के आसपास लोग कम होने लगे थे तो हमदोनो भी वहाँ से निकल पड़े। मुझे मेरे घर तक छोड़ने को आए रोहन को मैंने चाय के लिए बुलाना चाहा पर उन्होंने कल काफ़ी पर मिलने की बात कह कर टाल दिया। मैं दूर तक उन्हें जाते हुए देखती रही और कल फिर मिलने की आस में उत्साहित होते हुए मैं अपने फ़्लैट में आ गई। सच ही तो है जो भी होता है अच्छे के लिए ही होता है। मैंने लोगों से सुना था की जोड़ियाँ ऊपर से बन कर आती हैं और मेरे जोड़ी शायद रोहन के साथ ही बनाई गई थी।




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