पुनीत श्रीवास्तव

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4.4  

पुनीत श्रीवास्तव

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रिज़ल्ट दसवीं का ,१९९३

रिज़ल्ट दसवीं का ,१९९३

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आठवीं तक तो स्कूलों मेंं रिजल्ट की कोई ऐसी ख़ास उत्सुकता नही होती, स्कूल जाओ, मार्कशीट मिली पास हुए अच्छे नम्बरों से वरना बुरे नम्बरों से,असली कहानी है दसवीं की बारहवीं की ।दो साल की पढ़ाई के बाद होने वाले इम्तेहान की ।बड़ा सिलेबस, क्लास एक्स्ट्रा क्लास, कोचिंग सब के बाद दूसरे कॉलेज मेंं बोर्ड के इम्तेहान ।ये कभी समझ नही आया क्यों होता था या है ये ड्रामा, चौदह पन्द्रह साल के लड़के दूसरी जगह जाना, आने जाने के समय की बर्बादी .....ऐसे ही अपना भी हुआ दसवीं बोर्ड का इम्तहान विकास गाइड और न जाने क्या क्या कोचिंग और क्लास के बाद, जैसे तैसे इम्तेहान ख़त्म ।छुट्टियां शुरू ,हम चले ननिहाल, बलिया जिले के रसड़ा के नगहर के आगे कामसीपुर ।दिल्ली और बरेली वाले मामा मामी भी थे उस समय, कोई कार्यक्रम था शायद शुरू हुई मस्ती ट्यूबेल का नहान, बगीचे का आम और मस्ती दोस्तों के साथ, फिर अचानक खबर आई कहीं से, दसवीं का रिजल्ट आ गया ! दिल में हलचल, कभी कभी बवंडर गणित का पेपर गड़बड़ हुआ था, होने को तो अंग्रेजी भी कोई बहुत बढ़िया नही हुआ था,

कहीं फेल हो गए तब ?

बुरे ख़्याल जब आते हैं तब उनका एक क्रम होता है होड़ रहती है पहले ख़्याल से दूसरा और भयानक बने रहने की !और ये सतत प्रक्रिया चलती रहती है 

खैर हम और बड़का मामा चले रसड़ा !

वहीं मिलता पेपर !

रास्ते भर बड़े मामा असफल लोगों की कहानी सुनाते रहे, अरे वो फेल हो गया फिर पास हो गया !

उस समय समझ नही आया था कि,हौसला बढ़ा रहे हैं कि गिरा रहे हैं ! पेपर वाले ने रोल नम्बर मांगा फिर कॉलेज का नाम !!तुरंत प्रस्तुत काँपते हाथों से। 

बोला ! अरे उ त देवरिया जिला है, यहाँ खाली बलिया का मिलेगा कहिए तो कल मंगा दे ! ठीक है मंगा दीजिए ! फिर रसड़ा आये थे खाली हाथ कैसे जाते 7 किलोमीटर आना जाना बर्बाद हो जाता !एक किलो मशहूर लवंगलत्ता रसड़ा का खरीदाया,वापस गांव 

लवंगलत्ता खाते खाते पूरी बात बताई गई !

दो दिन बाद भैया जी मामा (मझले मामा) के साथ फिर रसड़ा। लगभग वही बाते रास्ते में पर भईया जी मामा डायरेक्ट पूछे !पास हो जाओगे न ? पीछे बैठे बैठे बोले हम्म म म म (अंतर्मन की आवाज वैसे मैच नही कर रही थी इस बीच ये बताते चलें कि फोन नही आया था तब तक ! रसड़ा पहुंचे पेपर लिया, पास थे सेकेंड डिवीजन ! मिठाई फिर ली गई, अबकी बार पास वाली !गांव आये तो ख़बर गाँव गाँव में फैल गई 

रमाशंकर बाबू के नाती पास हो गए !

क्योंकि भले कुछ दिन बाद ही रिजल्ट पता चला हो हमारे नाना के गाँव के पांच गांव सटे सारे विकेट गिरे हुए थे सब फेल ! अंधों मेंं काना राजा का असल प्रयोग होता देखते रहे ! बाद मेंं पता चला जब घर वापस आये, ज्यादतर लोग मोहल्ले के फ़र्स्ट क्लास पास हुए थे पर उनको क्या पता उनसे ज्यादे मिठाई हम सेकेंड क्लास पास होके खा और खिलवा दिए।

विजय पताका के साथ पांच गाँव वाली।


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