पतंगबाजी
पतंगबाजी
"शान" उठो , जल्दी से तैयार हो जाओ । हम सब छत पर पतंग उड़ाने जा रहे हैं । तुम भी बिना देर किए जल्दी से आ जाओ। नींद से हड़बड़ाहट में उठकर शान ने दौड़कर जाते हुए राहुल को आवाज देकर रोका और कहा "राहुल इस बार हम पतंग छत पर नहीं खुले मैदान में ही उड़ाएंगे। इसके लिए मैंने शहर के बीचों-बीच के खेल के मैदान की अथॉरिटी से बात कर ली है। इस बार से सभी वहीं पतंग उड़ाएंगे।"
"ऐसा क्यों? छत पर आसानी रहती है ना" राहुल ने पूछा।
"नहीं राहुल यह आसानी सिर्फ हमें होती है। हमारा शुभ दिन आकाश में उड़ने वालों के लिए मरण दिवस से कम नहीं होता। हमारे घर के आसपास के पेड़ों में जब मांझा फंस जाता है तब यही मांझा पक्षियों के लिए फांसी का फंदा बन जाता है। और हां एक और बात, इस बार हम पतंग उड़ाने के लिए सादा मांझा ही इस्तेमाल में लेंगे सबसे कह दो। कोई अगर मगर नहीं होगी। बेजुबान प्राणियों की सुरक्षा के लिए मेरे द्वारा लिए गए इस निर्णय से मैं चाहता हूं कि, तुम सभी को सहमत होना चाहिए। खुले मैदान में आसपास ज्यादा पेड़ नहीं हैं अतः मांजे की किसी डाली में उलझने की कोई गुंजाइश भी नहीं रहेगी और यकीन मानो इससे हमारी खुशियां उन्नीस नहीं बीस ही रहेंगी और तो और इस बार पतंगबाजी की प्रतियोगिता के प्रतिभागी हम सिर्फ दो-चार नहीं बल्कि शहर के कई और लोग भी होंगे। सोचो कितना आनंद आएगा इससे हमारी खुशियों में चार चांद तो लगेंगे ही व पक्षी भी चैन की सांस ले पाएंगे और अगले दिन पतंग उड़ाते हुए छत से गिरने जैसी खबरें भी अखबारों में पढ़ने को नहीं मिलेगी।"
राहुल की असमझ वाली स्थिति अब साफ-सुथरी हो चुकी थी।
इस बार वह "अच्छा मैं सबको बुला कर लाता हूं" कहकर छत की ओर दौड़ पड़ा।
