पतझड़ -15
पतझड़ -15
जगदीश अपने माँ -बाप को छोड़ने बस स्टेशन चला गया था और उधर ज्ञानवती घर के कामकाज निपटाने लगी थी । जब से विवाह हुआ था ,ज्ञानवती ने कितनी बार एकांत की चाह की थी । एकांत ,जब वह और जगदीश जी अकेले हों । अपनी भाभियों और सखियों से उनके मधुर - मिलन की कई कहानियाँ सुन चुकी ज्ञानवती भी ऐसे ही मधुर - मिलन के सपने देख रही थी । किस्मत से ,कुछ घंटे या कुछ दिन नहीं ;बल्कि पूरे 15 दिन एकांत के मिल रहे थे । लेकिन हाय री किस्मत ,अब ज्ञानवती को डर लग रहा था ;अब पुरुष के स्पर्श मात्र की कल्पना से उसकी रूह काँप उठती थी । पुरुष का स्पर्श उसके लिए किसी सर्पदंश से कम नहीं था ।
वह काम करते हुए यही सोच रही थी कि अब तो जगदीश जी के पास अवसर ही अवसर होंगे और अपनी पत्नी पर तो उनका पूरा हक़ भी बनता है । वह उन्हें कैसे रोकेगी ? क्या कहेगी ? क्या करेगी ?भगवान ,उसकी न जाने अभी कितनी परीक्षाएँ और लेगा ?
अम्मा -बाबूजी को छोड़कर जगदीश घर आ गया था । घर पहुँचने के बाद उसने दरवाज़े पर दस्तक दी । ज्ञानवती ने धीरे से दरवाज़ा खोला और दरवाज़े प् जगदीश को देखकर बिना कुछ बोले घर के अंदर चली गयी । रसोई का काम लगभग समाप्त हो गया था ,लेकिन जगदीश से बचने के लिए वह रसोई में घुस गयी और बर्तन इधर-उधर करने लगी ।
"सुनो ,मेरे लिए नाश्ता लगा दो और तुम भी कुछ खा -पी लो । ",जगदीश ने रसोई के सामने खड़े -खड़े कहा ।
"आप चाय लेंगे या दूध ?",ज्ञानवती ने पूछा ।
"दूध ही बना देना । ",जगदीश नेजवाब दिया और आँगन में चारपाई डालकर उसी पर बैठ गया ।
ज्ञानवती ने पराँठे और सब्जी जगदीश के सामने लाकर रख दिए थे । कुछ ही मिनटों में वह दूध का गिलास भी ले आयी थी । गिलास जगदीश के सामने रखकर वह वापस जाने के लिए मुड़ी ही थी कि जगदीश ने टोक दिया और कहने लगा कि ,"तुम भी मेरे साथ ही नाश्ता कर लो । "
"आप खा लो ,फिर मैं खा लूँगी । पति के साथ एक ही थाली में खाना खाने से पाप लगता है । ",ज्ञानवती ने कहा ।
"अरे ,तुम ऐसी परम्पराओं में विश्वास करती हो ? ये नियम और परम्परायें हम इंसान अपने लिए बनाते हैं ,हम इन परम्पराओं के लिए नहीं हैं । वक़्त के साथ नियम और परम्पराएँ बदलती रहनी चाहिए । ",जगदीश ने मुस्कुराते हुए कहा ।
"क्या मतलब ?",ज्ञानवती ने थोड़ा आश्चर्य और नासमझी के साथ कहा ।
"तुम्हें एक कहानी सुनाता हूँ ,फिर तुम समझ जाओगी । ऐसा करो अपने लिए अलग थाली ले आओ । खाते -खाते कहानी सुन लेना । ",जगदीश ने कहा ।
"ठीक है । ",अब इनसे ज्यादा बहस करने का कोई फायदा नहीं ,ऐसा सोचकर ज्ञानवती रसोई से अपने लिए भी परांठे और सब्जी ले आयी थी ।
"तो सुनो कहानी । "जगदीश ने ऐसा कहा और कहानी कहना शुरू कर दिया ।
हुआ यह कि एक बार किसी एक घर में बेटे का विवाह था। गृहस्वामिनी अर्थात दूल्हे की माँ विवाह की तैयारियों में व्यस्त थी;उसे दम भरने तक की फुर्सत नहीं थी ;चक्करघिन्नी की तरह इधर से उधर जा रही थी ।घर में बहू इतनी आसानी से थोड़े न आ जाती है । बारात के जाने की तैयारियाँ जोर-शोर से हो रही थी।होने वाली बहू के लिए ले जाए जाने वाले कपड़े ,जेवर आदि सामानों को पैक किया जा रहा था । इन सब के बीच घर में एक बिल्ली बड़ा उधम मचा रही थी। बिल्ली की शैतानियों से तंग आकर ,गृहस्वामिनी ने बिल्ली को पकड़कर घर के एक कक्ष में बंद कर दिया। सोचा कि जब बारात चली जायेगी ,तब दरवाज़ा खोलकर बिल्ली को बाहर निकाल देगी। बारात के जाने के बाद ,नयी बहू की आगवानी की तैयारियों में व्यस्त रहने के कारण ,गृहस्वामिनी दरवाज़ा खोलकर बिल्ली को बाहर निकालना भूल गयी। २ दिन बाद बारात वापस लौटी। नयी वधू के घर में प्रवेश की रस्में निभाई जाने लगी। तभी गृहस्वामिनी को बिल्ली की याद आई। वधू ने इधर घर में प्रवेश किया और उधर गृहस्वामिनी ने कक्ष का दरवाज़ा खोला।
दरवाज़ा खुलते ही बिल्ली कक्ष से बाहर निकलकर भागी और गृहस्वामिनी ने राहत की सांस ली। नयी वधू ने इस समस्त प्रकरण को अपने इस नए परिवार की परंपरा समझा। क्यूंकि नयी बहू बहुत ही संस्कारी थी। उसको संस्कारों का मतलब यही बताया गया था कि बड़े कुछ भी करें सबका आँख बंद करके ,बिना कोई सवाल किये अनुसरण करना। सवालों के जब हमारे पास जवाब नहीं होते तो हम आहत हो जाते हैं। हमारे अहंकार को ठेस पहुँचती है और हम सवाल पूछने वाले को डांट डपटकर या थप्पड़ मारकर चुप करा देते हैं।
तो नयी नवेली दुल्हन ने यह समझा कि," इस घर में लड़के के विवाह के दौरान बिल्ली को कक्ष में नयी बहू के आगमन तक बंद करके रखा जाता है। नयी बहू के आने के बाद द्वार खोलकर बिल्ली को बाहर निकाला जाता है। "और जब इस नयी बहू के पुत्र का विवाह हुआ ,तब तक गृहस्वामिनी अर्थात नयी बहू की सास स्वर्ग सिधार चुकी थी। नयी बहू ने बिल्ली वाली परंपरा का पालन किया। समय के साथ साथ यह उस घर की परंपरा ही बन गयी। धीरे धीरे उसमें और भी कई नयी बातें जुड़ती गयी ,जैसे यदि बिल्ली ज़िंदा निकलती है तो नयी बहू के कदम शुभ है ;नहीं तो नयी बहू के कदम अशुभ है। गृहस्वामिनी के घर में बिल्ली उधम मचा रही थी ,लेकिन बाद में तो रस्म निभाने के लिए बिल्ली ढूंढी जाने लगी। नहीं मिलने पर ,पालतू बिल्ली खरीद कर भी परंपरा का निर्वाह किया जाने लगा।
"अच्छा । बिल्ली पकड़ना कितना मुश्किल हो जाता होगा । ",ज्ञानवती ने प्रश्न किया ।
"हाँ ,बिलकुल । यदि नयी बहू या बाद में आने वाली बहुएं इस परम्परा के पीछे का तर्क ढूंढ़ने का प्रयास करती तो शायद बिल्ली ढूंढ़ने की ज़रुरत नहीं पड़ती। कायदे ,कानून , परम्पराएं सब इंसान अपने जीवन को सुगमता से चलाने के लिए बनाते हैं। समय के अनुसार उनमें परिवर्तन होना ही चाहिए। जो परम्पराएं हमारे जीवन के संचालन में बाधा डालें ,उन्हें तुरंत त्याग देना चाहिए। जिसे निभाना पड़े ,उसे छोड़ना ही अच्छा है।",जगदीश ने कहा ।
दोनों का नाश्ता हो गया था । जगदीश कुछ देर के लिए बाहर टहलने चला गया और ज्ञानवती घर के काम निपटाने में लग गयी ।
