नया घर और.....(भाग-8)
नया घर और.....(भाग-8)
शाम में गुरुजी आए और एक एक करके पूरे घर को ध्यान से देखने लगे। घर, आँगन, आसपास की सड़कें सभी को बारीकी से देख रहे थें।। रजनी-रमेश उनके साथ हर जगह जा रहे थे। गुरुजी ने पूछा कुछ जानकारी मिली घर के बारे में ! रमेश ने कहा समय थोडा काम था तो बहुत कुछ तो नही पता चला लेकिन आसपास के घरों से पता करने की कोशिश करी हम दोनो ने। ज़्यादातर घरों में तो नए लोग है जो इस घर के बारे में कुछ नही जानते बस बाज़ू वाले घर में रहने वाली बूढ़ी अम्मा को घर के बारे में कुछ पता था। वह लगभग साठ-बासठ साल से यहाँ रह रही हैं। उन्होंने बताया जब वह शादी करेके ससुराल आई यानी जिस घर में वह रहती हैं तो उस समय इस घर में एक दम्पति अपने तीन साल की बेटी के साथ रहता था। उनकी सास ने बताया था कि पड़ोसी ने अभी दो साल पहले ही यह नया घर बनवाया था और तभी से यहाँ रह रहे हैं। अच्छे लोग थे। अजित और शालिनी नाम था उनका और रजनी उनकी बिटिया थी। बिटिया के पास एक गुड़िया थी जिसे वह हमेशा अपने साथ रखती थी सोते-जागते, खाते-पीते हर समय। यहाँ तक कि जब वह कालेज जाने लगी तब भी गुड़िया अपने झोले में डाल ले जाती थी। सबसे प्यारा खिलौना था वह उसका।
मेरे और शालिनी में यूँ तो उम्र में आठ-नौ वर्ष का फ़र्क़ था लेकिन फिर भी हम दोनो अच्छे दोस्त बन गए थे। एक दूसरे से सारे सुख-दुःख बाँटते थे। उन्हें अपनी एकलौती बेटी से बहुत प्यार था। किंतु हम जैसा सोंचते है वैसा ही हो ज़रूरी तो नही। बेटी को उसकी इच्छा अनुसार पढ़ाने में अजित और शालिनी ने कोई कसर नही छोड़ी थी। वह जो और जितना पढ़ना चाही कभी रोका नही। उसने विदेश जा कर आगे पढ़ने को कहा वह भी दिल पर पत्थर रख कर मान लिए। लेकिन शायद यह उन दोनो की सबसे बड़ी गलती थी। उनकी बेटी रजनी को वहाँ विदेश में एक लड़का पसंद आ गया और वह उससे शादी कर वहीं विदेश में बस जाना चाहती थी। बहुत समझाया दोनो ने लेकिन सफल नही हुए उसे यह शादी नही कराने में। भारी मन से एक विदेश लड़के से अपनी बेटी रजनी की शादी कर दी। बेटी विदेश में जा बसी। बेटी इन दोनो को अपने साथ रहने को विदेश भी ले गई लेकिन दोनो वहाँ नही रह सके और वापस आ गए। अब तो दोनो को ज़्यादा समय आँगन में लगे झूले पर ही गुजरने लगा था। सुबह की चाय के साथ ही दोनो झूले पर आ बैठते और शाम की चाय के बाद ही घर के अंदर जाते थे। इस दौरान उनके साथ होती थी उनकी बेटी रजनी की प्यारी गुड़िया जिसे शालिनी ने बेटी को विदा करते समय उससे माँग के अपने पास रख लिया था।
शादी के बाद रजनी कभी तीन महीने में तो कभी चार महीने में शालिनी-अजित से मिलने आ जाती थी लेकिन जैसे जैसे उसका परिवार बढ़ता गया उसके आने के समय की बीच की दूरी भी बढ़ती गई। रजनी अपने पति और परिवार के साथ बहुत खुश थी। अजित – शालिनी भी उसे खुश देख बहुत खुश होते और देशों के बीच की दूरी अब नही खलती थी। अब रजनी दो बच्चों की माँ हो गई थी सो जल्दी-जल्दी आना सम्भव नही था फिर भी साल में दो बार तो ज़रूर ही आती थी। दामाद जी भले ही ना आए पर वह बच्चों के साथ ज़रूर आ जाती थी और महीने भर से पहले नही जाती थी। उस समय अजित और शालिनी तो जैसे बच्चे ही बन जाते थे।
समय के साथ साथ दोनो के उमर बढ़ती जा रही थी और स्वस्थ कमजोर होता जा रहा था। आज से लगभग बारह-तेरह साल पहले अजित की तबियत बहुत ज़्यादा ख़राब हो गई थी। तब रजनी और उसके पति ने सारे काम-काज छोड़ कर यहाँ आकर अजित और शालिनी की देखभाल करी थी। दोनो पति-पत्नी ने पूरी कोशिश की थी अजित-शालिनी को अपने साथ ले जाने की पर दोनो नही माने। बहुत दिनों से रजनी और उसके पति भारत में थे सो उन्हें भी वापस जाना था। जब अजित -शालिनी नही माने तो दोनो बच्चे इन्हें यहाँ छोड़ कर चले गए। जाने से पहले रजनी ने एक महिला को अजित-शालिनी की देखभाल के लिए रख गई थी। अभी दोनो को गए महीना भर भी नही बीता था कि एक रात अचानक अजित की तबियत बहुत ख़राब हो गई। मेरे पति और बेटा ही उन्हें ले कर अस्पताल गए थे। शायद भगवान की कुछ और ही इच्छा थी। सारी कोशिश के बाद भी अजित को नही बचाया जा सका। उसी रात अजित सबकूछ छोड़ कर दूसरी दूनिया में चले गए। अगली दोपहर जब रजनी घर पहुँच तो उसे अपने पिता का ठंडा शरीर मिला देखने को। बहुत रोई थी वह अपनी माँ शालिनी के गले से लग कर। बार-बार दूर देश बसने के अपने फ़ैसले को कोसती। ऐसे में शालिनी उसे कहती जो आया है वह तो जाएगा ही। पर रजनी को बहुत अफ़सोस था की वह अपने पिता से उनके अंतिम पलों में मिल नही पाई। क्रमशः
