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Rajesh Kumar Shrivastava

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मकर संक्रांति

मकर संक्रांति

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मकर संक्रांति सौर पंचाग आधारित सामाजिक तथा धार्मिक पर्व है । सौर पंचाग के अनुसार मनाये जाने पर भी संक्रांति का समय हमेशा एक सा नहीं रहता । यह प्रत्येक ७२ वर्षों में एक दिन आगे बढ़ जाता है । इसका कारण सूर्य की परिक्रमा में पृथ्वी द्वारा लगने वाला समय है । पृथ्वी, सूर्य की एक परिक्रमा में ३६५ दिन ६ घंटे तथा २० मिनट में करती है । प्रत्येक चौथे वर्ष एक दिन बढ़ा देने (जोड़ देने) पर भी २० मिनट समायोजित होने के लिए शेष रह जाता है । जो ७२ वर्षों में एक दिन के बराबर हो जाता है ।


यही कारण है कि ईसा पश्चात तीसरी शताब्दी के उत्तरार्ध तथा चौथी शताब्दी के पूर्वार्ध में मकर संक्रांति २५ दिसंबर को मनाई जाती थी । इसी तरह स्वामी विवेकानंद के जन्मदिवस १२ जनवरी सन् १८६३ को मकर संक्रांति थी । सन् १९१०-१५ में मकर संक्रांति १३ जनवरी को मनाई जाती थी । वर्तमान काल में मकर संक्रांति १५ जनवरी को मनाया जाता है ।


यह पर्व पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिक्रमा करने पर आधारित है । अध्ययन की सुविधा हेतु पृथ्वी की नकल (ग्लोब) पर अक्षांश व देशांतर रेखाओं की कल्पना की गई है । उत्तरी गोलार्द्ध में भूमध्य रेखा के समानांतर साढ़े २३ अंश उत्तरी अक्षांश रेखा को कर्क रेखा तथा दक्षिणी गोलार्द्ध की साढ़े २३ अंश दक्षिणी अक्षांश रेखा को मकर रेखा कहा जाता है । दोनों के बीच कल्पित भूमध्य रेखा है जहाँ वर्ष भर सूर्य की किरणे सीधी पड़ने की वजह से भीषण गर्मी पड़ती है । सूर्य जब मकर रेखा पर अंतिम बिंदु तक गति करने के पश्चात जिस क्षण कर्क रेखा की ओर संक्रमण करता है उसी क्षण को मकर संक्रांति कहा जाता है ।

ईसाई पंचाग (कैलेंडर) के जून माह में कर्क रेखा पर अंतिम बिंदु तक चमकने के बाद जब सूर्य मकर रेखा की ओर संक्रमण करता है अर्थात दक्षिणायन होता है तब कर्क संक्रांति मनाई जाती है ।


कर्क संक्रांति के पश्चात दिन का मान घटने तथा रात का बढ़ने लगता है । गर्मी कम होने लगती है तथा शीत की मात्रा क्रमशः बढ़ती जाती है । दिसंबर आते आते ठिठुरन चरम बिंदु तक पहुंच जाती है । उत्तरी ध्रुव के निकटवर्ती शीत कटिबंधीय इलाके में जीवन कठिन हो जाता है । हिमालय की वजह से हमारे देश में साइबेरिया की ओर से आने वाली शीत लहर का पूरा असर नहीं हो पाता , फिर भी समूचा उत्तर व पश्चिमी व मध्य भारत ठंड से बुरी तरह.से प्रभावित होता है । इसका प्रभाव मनुष्यों पर ही नहीं बल्कि जीव जंतुओं तथा वनस्पतियों पर भी दिखाई पड़ता है । शीत रक्त वाले जंतु शीत निद्रा में चले जाते हैं । पेड़ पौधे तथा रबी की फसलें ठंड व पाला पड़ने से प्रभावित होती हैं ।


चूंकि सूर्य ही सौर मंडल का राजा है । सभी ग्रह, उपग्रह तथा नक्षत्र आदि सूर्य की परिक्रमा करते हैं ।सूर्य से ही चराचर को प्रकाश तथा ऊष्मा प्राप्त होती है । सूर्य जीवन दाता है , सूर्य आनंद दाता है इसीलिए सूर्य देवता है । वैदिक हिन्दू धर्म में सूर्य प्रधान तथा प्रत्यक्ष देवता है । यही कारण है कि कर्क संक्रांति धूमधाम से नहीं मनाई जाती क्योंकि तब जीवन धन (सूर्यदेव) हमसे दूर दक्षिण की ओर बढ़ते हैं । मकर संक्रांति में सूर्य देव छ: मास तक अपना तेज दक्षिणी गोलार्ध को देने के पश्चात जब उत्तर की ओर मुख करते हैं तब उनके स्वागत में मकर संक्रांति धूमधाम से मनाई जाती है । प्राचीन काल में वैदिक धर्मावलंबी पूरे विश्व में थे तब दोनों संक्रान्तियों को हर्षोल्लास से मनाया जाता था । अनेक कारणों से जिन क्षेत्रों से वैदिक धर्म का लोप होता गया वहाँ या तो वैदिक उत्सव मनाया जाना बंद हो गया अथवा उसके नाम तथा मनाये जाने के तौर तरीकों में इतना परिवर्तन हो चुका है कि अब उसे मुश्किल से ही पहचाना जा सकता है ।


जिस क्षण मकर संक्रांति होती है उस क्षण की ग्रहों-नक्षत्रों की स्थितियों का अध्ययन करके ज्योतिष विज्ञान में संक्रांति का फलादेश तैयार किया जाता है इसमें आगामी वर्ष में वर्षा,अल्पवृष्टि. अतिवृष्टि फसल उत्पादन, बाजार की स्थिति धातु वस्त्र आदि के उत्पादन तथा कीमतों आदि,तथा देश-विदेश की राजनैतिक तथा सामाजिक स्थितियों का आंकलन किया जाता है । आज भी अपने पुरोहित से संक्रांति का फल सुनने का रिवाज है । हालांकि यह रिवाज अब गाँवों में ही शेष रह गया है । शहरों में यह लुप्त होती जा रही है ।


मकर संक्रांति का धार्मिक तथा सामाजिक महत्व आदि काल से ही रहा है । यह पर्व सामाजिक एकता को बढ़ाता है । इस दिन तिल तथा गुड़ से बने व्यंजन खाया खिलाया जाता है । वनभोजों का आयोजन होता है जिसमे तिल मिश्रित खिचड़ी पकाई तथा खाई और खिलाई जाती है । 

मकर संक्रांति के अवसर पर गंगा स्नान तथा तिलदान की विशेष महिमा शास्त्रों में कही गई है । मकर संक्रांति के दिन तीर्थराज प्रयाग में तथा गंगासागर में गंगास्नान से अनंत पुण्य फल की प्राप्ति होती है । इलाहाबाद में प्रत्येक वर्ष गंगा जी के तट पर एक मास का मेला व कल्पवास होता है । इसमें संक्रांति मुख्य स्नान पर्व है । इस दिन प्रयाग में बीसों लाख लोग संगम स्नान कर पुण्य के भागी बनते हैं । जो लोग गंगा स्नान के लिए नहीं जा सकते वे तिल का उबटन लगाकर घर पर या स्थानीय नदी सरोवर में स्नान कर तिलदान करते हैं । मकर संक्रांति पर ही गंगासागर का विश्व प्रसिद्ध मेला लगता है ।


 हावड़ा, (कोलकाता) से लगभग १६८ मील की दूरी पर गंगासागर द्वीप स्थित है , यहीं प्रसिद्ध कपिल मुनि का आश्रम था जहाँ राजा सगर के साठ हजार पुत्र (सैनिक पुत्र) ऋषि के शाप से भस्म हो गये थे । इन्हीं के उद्धार के लिए महाराज भगीरथ गंगाजी को धरती पर लाने में कृतकार्य हुये थे । गंगाजी भगीरथ के पीछे पीछे चलकर सागर द्वीप तक पहुंची तथा सगर पुत्रों का उद्धार कर तत्पश्चात समुद्र में मिली थीं ।समुद्र में लगभग १७० मील तक बहने पर भी श्रीगंगाजी, गंगा जी ही रहती है ।

 गंगासागर द्वीप का कुछ भाग चार वर्षों बाद जल से बाहर आता है इसलिए यह कहावत प्रसिद्ध है कि ‘बाकी तीरथ चार बार, गंगासागर एक बार ‘ । इसका बिगड़ा हुआ उच्चारण इस प्रकार रुढ़ हो चला है --सारे तीरथ बार-बार, गंगासागर एक बार । ऐसा शायद गंगा सागर की कठिन यात्रा को देखते हुए भी जनमानस ने स्वीकार कर लिया हो । गंगा स्नान कर ब्राह्मणों को तिलदान किया जाता है । तिलदान के संबंध में ब्रम्ह वैवर्त पुराण में कहा गया है कि ‘-जो भारतवर्ष में ब्राम्हण को तिलदान करता है वह तिल की संख्या के बराबर वर्षों तक विष्णु लोक में आदर मान प्राप्त करता हुआ रहता है । उसके बाद उत्तम योनि (कुल) में जन्म लेकर चिरजीवी हो सुख भोगता है । ताम्रपात्र में तिलदान का फल दोगुना हो जाता है ----

तिलदानं ब्राम्हणाय य करोति च भारते ।

तिल प्रमाण वर्षं च मोदते विष्णु मंदिरे ।।

तत:स्वयोनि संप्राप्य चिरजीवी भवेत्सुखी ।

ताम्रपात्र स्थदानेन द्वि गुणं च फलं लभेत् ।।


          

    



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