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Rajesh Kumar Shrivastava

Children Stories

4  

Rajesh Kumar Shrivastava

Children Stories

मुर्गी और सियार

मुर्गी और सियार

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      महा वन में एक सियार रहता था। वह बड़ा ही चालाक और धूर्त था। उसकी मीठी लच्छेदार भाषा से अच्छे-खासे चतुर-चालाक जीव भी धोखा खा जाते। वह महावन के लगभग सभी जानवरों को ठग चुका था। 

 जब तक वह जवान रहा उसे खाने की कमी नहीं हुई। वह इतना दिलेर था कि मौका मिलते ही शेर, तेंदुए तथा चीते के शिकार पर हाथ साफ कर देता था।

कहावत है कि ‘जवानी में ऐश करने वाल़ों को दाल आटे का भाव बुढ़ापे में पता चलता है।‘ वह सियार भी जब तक जवान रहा डटकर खाया-पीया और ऐश किया। फिर जैसे जैसे उस पर बुढ़ापा हावी होते गया उसे खाने पीने के लाले पड़ने लगे। 

चूँकि वह महा वन के ज्यादातर पशु-पक्षियों को ठग चुका था, साथ ही उसकी ठगी तथा मक्कारी के अनेकों किस्से मशहूर थे अतः महा वन के पशु-पक्षी उससे खबरदार थे। कोई बिरला ही उसके झाँसे में फँसता था। इसी कारण उस धूर्त को खाने के लाले पड़ने लगे।

वह कब तक भूखा-प्यासा रहता। अंत: वह महा वन के बाहरी हिस्से में मनुष्यों की बस्ती के समीप जाकर रहने लगा।

 सियार ने नये स्थान पर साधु के वेष मे रहने का निश्चय किया। असली साधु बनना जितना कठिन है नकली साधू बनना उतना ही सरल है। दाढ़ी-मूछ बढ़ा लो माथे पर चंदन का बड़ा सा तिलक लगा लो, गले में दो-चार मालायें डाल लो , गैरिक (भगवा) वस्त्र पहन लो और बन जाओ साधु जैसा ! 

जनता की आस्था गृहत्यागी साधू-संतों पर होती है। इसी का फायदा धूर्त, बेईमान तथा असमाजिक तत्व नकली साधु बनकर उठाते हैं। 

सियार माथे पर तिलक, गले में रंग बिरंगे मनकों की माला, सिर पर केसरिया टोपी तथा कमर में भगवा वस्त्र धारण कर साधु बन गया। उसने महुआ वृक्ष के नीचे पत्थरों का छोटा सा चबूतरा बनाया और उस पर संतों की भाँति ध्यान लगाकर बैठ गया।

अब उसे ऐसे मूर्ख पशु-पक्षी की प्रतीक्षा थी जो उसके साधु वेष पर भरोसा करने तथा उसके करीब आने को राजी हो जाये जिससे वह आसानी उसे अपना निवाला बना सके।

सियार चतुर था साथ ही उसमें धीरज की कोई कमी न थी। वह घंटों ध्यान मग्न रहता। समीप स्थित बस्ती के घरेलू तथा पालतू पशु पक्षी भोजन की तलाश में वहां आते थे। जब उन्होंने सियार को वृक्ष तले आसन जमाये देखा तब उन्हें भय मिश्रित आश्चर्य हुआ। सियार का साधु बनना यह अविश्वसनीय घटना थी।

पशु-पक्षियों ने देखा कि वह सियार हमेशा ध्यानमग्न रहता है। आने-जाने वाले किसी भी पशु-पक्षी को नुकसान पहुँचाना तो दूर वह उन्हें आँख उठाकर भी नहीं देखता। उनके लिए यह नयी तथा अनोखी घटना थी

घरेलू तथा पालतू पशु-पक्षियों में यह चर्चा होने लगी कि-‘ इसका शरीर भले ही एक सियार का है परन्तु स्वभाव संतों के जैसा है। यह बहुत पहुंचा हुआ महात्मा लगता है, जो यहाँ तपस्या करने तथा अपना परलोक सुधारने आया है अतः हमें इससे कोई खतरा नहीं है।‘ 

वह धूर्त यही तो चाहता था कि पशु पक्षी उस पर भरोसा करें ! उनका विश्वास जीते बिना उसका स्वार्थ सिद्ध होने वाला नहीं था। इसलिए उसे कोई जल्दी नहीं थी। तर माल की दावत उड़ानी हो, तो धैर्य तो रखना ही पड़ता है। 

कुछ दिन बीते। ढोंगी सियार का वहाँ आना और धूनी रमाना पुरानी घटना हो गयी। एक दिन सियार ध्यान लगाये बैठा था। वह कनखियों से देख रहा था कि उससे थोड़ी ही दूरी पर एक मोटी-ताजी मुर्गी दाना चुग रही है। मुर्गी को देख उसके मुंह में पानी भर आया। वह मन ही मन उसे उदरस्थ करने की योजना बनाने लगा।

कुछ देर बाद उसने मुर्गी को पुकारा –‘ मुर्गी रानी ! ओ मुर्गी रानी !! साधू का एक काम करोगी !’

मुर्गी चौंक गयी। उसने पहली बार सियार को जागृत अवस्था में देखा था उसने दूर से ही साधुवेष धारी सियार को प्रणाम किया और बोली – ‘मेरा अहोभाग्य भगवन ! आज्ञा कीजिए !’ 

सियार बोला – हे कुक्कुटी ! मै बूढ़ा हो गया हूँ। मुझे आँखों से कम दिखाई देता है साथ ही जोर से बोलने पर मेरी साँसें भर जाती है, दिल की धड़कनें बढ़ जाती है। इसलिए क्या तुम थोड़ा करीब आओगी ! 

मुर्गी बोली- भगवन ! आप भले ही साधु के वेष में हैं किन्तु देह तो सियार का ही है। हम मुर्गियाँ सियारों का स्वाभाविक भोजन हैं अतः मेरा आपके समीप आना नीतिसंगत नहीं है।

साधु ! साधु ! अति उत्तम !!—वह सियार बोला -हे कुक्कुटी ! तुमने सत्य कहा। मैं सियार कुलोत्पन्न हूँ अतः तुम्हारा संशय करना उचित ही है। नीति भी यही कहती है कि भली-भाँति जाँच-पड़ताल तथा परीक्षा लेने के बाद ही किसी अपरिचित पर विश्वास करना चाहिए। जो ऐसा नहीं करता उसे घोर दुखों की प्राप्ति होती है।

सियार से नीति तथा ग्यान-ध्यान की बातें सुनकर मुर्गी गदगद हो गयी। फिर भी उसके मन में अभी संदेह शेष था इस कारण वह मात्र चार कदम आगे बढ़ी। उसके एकदम पास नहीं गयी।

वह बोली -हे साधु बाबा ! मैं कैसे विश्वास करुँ कि आप मुझे खायेंगे नहीं ?

सियार ने उत्तर दिया – हे कुक्कुटी रानी ! जो मनुष्य गृहस्थ जीवन को छोड़कर साधुओं का बाना धारण करता है। उसे मास- मदिरा आदि अखाद्य वस्तुओं का सेवन छोड़ना पड़ता है। जो साधू भूल से भी ऐसा करता है उसे हजारों वर्ष तक कुंभीपाक आदि नरकों में दुख भोगना पड़ता है। वहाँ यमदूत लोग ऐसे जीव को जबरन कीड़े मकोड़े तथा विष्ठा आदि खिलाते है। अतः साधु होने की पहली शर्त सात्विक भोजन ग्रहण करना है। साधु बनते समय मैंने मांसाहार का पूर्ण त्याग तथा शाकाहारी बनने का प्रण लिया है।

मुर्गी बोली -हे महात्मन ! आप स्वभाव से ही मांसाहारी जीव हैं। कंद मूल तथा फल फूल से आपका निर्वाह कैसे संभव है ?

यह सुनकर सियार का कलेजा लरज गया। ओह ! यह मुर्गी तो काफी चतुर है, इसे बेवकूफ बना लिया तब आगे पौ बारह ! वह उसकी प्रशंसा करने से स्वयं को रोक नहीं सका। 

सियार की किस्मत अच्छी थी। उस समय वहाँ से थोड़ी ही दूरी पर एक भैंस घास चर रही थी। 

सियार ने भैंस की ओर इशारा करते हुए कहा – मुर्गी रानी ! उधर देखो ! वह मेरी पालतू भैंस है, मैं इसी के दूध पर अपना निर्वाह करता हूँ। शुद्ध दूध के आगे मास-मछली आदि समस्त तामसिक भोजन तुच्छ है।

इसके बाद मुर्गी को सियार के असली साधू होने पर कोई संदेह न रहा। वह उसके जरा और निकट चली गयी और बोली – हाँ तो महात्मन ! मैं आप की क्या सेवा कर सकती हूँ ? आज्ञा कीजिए ! 

धूर्त सियार अपनी किस्मत और चतुराई पर मन ही मन खुश हुआ। प्रकट में उसने कहा – हे कुक्कुटी ! मैं इतना बूढ़ा हो चुका हूँ कि मुझे अपने अंगों पर पहले जैसा नियंत्रण नहीं रहा। आज सुबह मेरा शीशा (दर्पण) टूट गया। इसलिए आज मेरा व्रत अधूरा है तुम चाहो तो वह पूरा हो सकता है ! 

संतों की सेवा करना गृहस्थ का पहला कर्त्तव्य है, जो भी गृहस्थ संतों की सेवा से जी चुराता है उसका आधा पुण्य नष्ट हो जाता है ऐसा मुर्गी ने सुना हुआ था। अतः उसने कहा – आज्ञा कीजिए भगवन् ! आप जैसे महान संत का काम करके मुझे बहुत प्रसन्नता होगी ! 

सियार बोला – हे धर्मप्राण विदुषी कुक्कुटी ! साधू-संतों तथा धर्म के प्रति तुम्हारी निष्ठा प्रशंसनीय है। तुम्हारी जैसे निष्ठावान गृहस्थों के कारण ही इस कलिकाल में भी धर्म जीवित है। मेरा आशीर्वाद है, तुम्हारा कल्याण हो ! तुम्हारी सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो !!

सेवा से पहले ही बिना माँगे वरदान मिल जाये तब इससे बढ़कर खुशी और क्या होगी ? मुर्गी रानी गदगद हो गयी।

सियार ने आगे कहा – हे कुक्कुटी रानी ! दर्पण के अकस्मात टूट जाने के कारण मैं आज अपनी जीभ पर चंदन से ‘’राम-राम’’ नहीं लिख पाया हूँ इसलिए मेरा ध्यान बारम्बार भंग हो रहा है। यदि तुम मेरी जीभ पर ‘राम-राम’ लिख दो तो मुझ पर बड़ी कृपा होगी ! 

मुर्गी पर धूर्त सियार की चिकनी-चुपडी बातों का इतना प्रभाव हो चुका था कि उसकी विवेक शक्ति शिथिल हो चुकी थी। 

वह बेधड़क होकर सियार के समीप चली गयी और अपनी चोंच को चंदन में डुबाकर जैसे ही उसके जीभ मे ‘राम’ लिखना चाहा वैसे ही धूर्त सियार ने उसे सिर को अपने पैने दांतों मे दबोच लिया। बेचारी मुर्गी कर भी क्या सकती थी।

मुर्गी को उदरस्थ करने के बाद वह पुनः ध्यानस्थ हो गया।  


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