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Krishna Raj

Others

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Krishna Raj

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मीरा की पाती....

मीरा की पाती....

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मेरे अपने कान्हा,

तुम से दूरी का एहसास क्यों हुआ क्या पता.. जबकि तुम तो मेरे रोम रोम में हो न... और मैं तुम्हारी सांसो में... सब कुछ तो पता है.. हम दोनों एक दूसरे के दिल में धड़कते है.. 

कान्हा हर पल तुम्हारी आवाज की अभ्यस्त मैं जब अचानक उस आवाज से दूर हुई तो विचलित हो गई... तुम सी मजबूत नहीं हूं न.. पर ऐसा नहीं होना चाहिए था न.. तुम तो मेरे आधार स्तम्भ बन कर मेरे साथ हो.. ना जाने कितने जन्मो से और आगे कितने जन्मो तक.. 

तुम्हारा एहसास तो मेरे चारों तरफ एक अदृश्य कवच सा लिपटा हुआ है... 

पर मैं क्यों कमजोर पड़ी कान्हा... तुमने तो हमेशा यही समझाया न, जरूरी नहीं कि मिलाप का मतलब मिलन ही हो... तुम्हें तो मैंने बिना मिले बिना देखे पूजा है.... फिर क्यों मैं विचलित हुई... 

जब से तुम्हें पूजा है तुमने हर पूजा को स्वीकार किया... तुम तो राजा हो कान्हा और मैं राह की धूल, जिसे तुमने उठाकर अपने हृदय से लगाया.. मैं तो इस काबिल भी नहीं कान्हा की तुम्हें कुछ दूँ.. और दे भी क्या सकती हूं, तुम सर्व शक्ति मान देव हो और मैं साधारण इंसान... और हम इंसान विचलित हो जाते हैं कान्हा... हम इंसानों में बस यही नहीं होता जिसे धैर्य कहा जाता है... 

कान्हा तुम्हें पूजा है तुम्हें चाहा है... तो तुमसे शिकायत करने का तुमसे लड़ने का तुमसे जिद करने का तुम पर गुस्सा होने का थोड़ा अधिकार नहीं है क्या मुझे.. मेरा सब तुमसे ही तो है न.. तो तुम्हें ही दिखा सकती हूं न.. प्यार या गुस्सा,  

अपनी तड़प अपने आंसू अपनी पुकार तुम तक पहुंचाने का जो जरिया मुझे मिला वो किया... 

तुम्हारे लिए जो दीवानगी है कान्हा वो तड़प बन कर निकली बस.. और कुछ नहीं.. 

पर कान्हा मैंने आज भी तुमसे कुछ नहीं माँगा.. मैंने शिकायत की, पर माँगा कुछ नहीं... मैं अपने वादे से पीछे नहीं हटी कान्हा... ना कभी हटूंगी,

जिस बात ने तुम्हें मेरे करीब किया था, वो बात आज भी वैसी ही है मेरे प्रिय.. 

मैं तो शांत ही हो चुकी थी न कान्हा... पर तुमने ही कहा कि अपनी तड़प अपना गुस्सा बाहर निकाल दो.... बस यही किया है... तुमसे कुछ नहीं चाहा कान्हा.. तुम्हारी मरज़ी के बिना तो तुम्हारा वक्त भी नहीं... 

तुम्हारे दिल में ये बात आ ही गई कि मैं अपने वादे से पीछे हो रही हूं.... शायद मेरी अपनी किसी कमी से ये हुआ होगा न.. 

कान्हा मैं नहीं जानती कि जिस एक बात से तुम मेरे करीब आए थे, वो बात अब है या थी हो चुकी, नहीं पता.. 

पर मेरे कान्हा विश्वास कर सको तो, आज भी तुम्हारी मीरा अपनी उसी बात पर अडिग है और सदा रहेगी... 

तुम जो जो चाहते हो वही करेगी... तुमने मीरा को मीरा बनाया है कान्हा, तुम्हारे दिए इस नाम को इस छवि को कभी धूमिल नहीं होने देगी तुम्हारी दासी.. 

कान्हा तुम जो चाहते वही होगा... मीरा अब मीरा बनेगी, अपने श्याम की अपने मोहन की अपने प्रभु की.. 

...तेरे पास में बैठना भी इबादत

तुझे दूर से देखना भी इबादत,  

... न माला, न मंतर, न पूजा, न सजदा

तुझे हर घड़ी सोचना भी इबादत 



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