माला के बिखरे मोती (भाग ७४)
माला के बिखरे मोती (भाग ७४)
अब आरती को आराम करने की सलाह देकर और जय को आरती का ख़्याल रखने को बोलकर सभी महिलाएं आरती के कमरे से बाहर निकल गई हैं।
अब जय आरती के पास आकर बैठ गया है। जय ने आरती का हाथ थामकर कहा,
"आरती, तुम किसी बात को लेकर परेशान हो, मुझे इसका अहसास तो था। लेकिन वह परेशानी तुम पर इतनी हावी हो जाएगी, मैंने यह नहीं सोचा था। तुम मुझे बताओ, तुम किस बात को सोच सोचकर इतनी परेशान हो?"
आरती (बात को टालते हुए): कोई बात नहीं है जी। मैं ठीक हूं।
जय: नहीं, कोई बात तो है, जो तुम्हें अंदर ही अंदर खाए जा रही है। मुझे बताओ?
आरती (लंबी साँस छोड़ते हुए): जी, आप मुझे बताइए, मैं कौन हूं?
जय: यह कैसा सवाल हुआ भला? सब जानते हैं कि तुम आरती हो। मेरी पत्नि हो।
आरती: इसके अलावा?
जय: तुम मेरी दो प्यारी प्यारी बेटियों की माँ हो। इतने बड़े ठाकुर परिवार की सबसे बड़ी बहू हो।
आरती: और?
जय: और क्या? चार चार देवरों की भाभी हो। चार देवरानियों की जेठानी हो।
आरती: ये सब तो ठीक है। लेकिन इन सबके अलावा मैं कुछ और भी हूं क्या?
जय: मैं तुम्हारा मतलब नहीं समझा?
आरती: मैं आपसे पूछना चाहती हूं कि मैं क्या हूं? मेरा ख़ुद का वजूद क्या है?
जय: तुम एक औरत हो। बिना रिश्ते नातों के, औरत का कोई वजूद नहीं होता है।
आरती: रिश्ते नातों के बिना तो किसी पुरुष का वजूद भी नहीं होता है। यहाँ बात रिश्ते नातों की नहीं हो रही है। मैं आपसे मेरे ख़ुद के अस्तित्व के बारे में पूछ रही हूं।
जय: जब तुम इतने बड़े परिवार में सबसे बड़ी बहू बनकर आई थीं, तबसे ही तुम्हारी पहचान इस परिवार से है।
आरती: चलिए, कोई बात नहीं। मुझे लगता है कि आप मेरी बात को नहीं समझ रहे हैं। या शायद समझना नहीं चाहते हैं।
जय (थोड़ा तुनककर): शादी के इतने सालों के बाद और दो जवान बेटियों की माँ बन जाने के बाद तुम्हारा इस तरह अपने अस्तित्व के बारे में सवाल करना, मुझे समझ नहीं आ रहा है।
जय के यह बात कहने के तल्ख़ तरीक़े और सख़्त शब्दों को सुनकर आरती फूट फूटकर रोने लगी है। आरती का रोना सुनकर भावना दौड़ती हुई आरती के कमरे में आ गई है। वह जय की ओर देखती हुई बोली,
"जय भैया, आपने आरती भाभीजी से ऐसा क्या कह दिया है, जो ये इस तरह रोने लगी हैं।"
जय: मैंने ऐसा कुछ भी नहीं कहा है, जिससे आरती को दुख पहुंचे।
भावना: ठीक है भैया। चलिए, अब आप डाइनिंग हॉल में जाकर नाश्ता कर लीजिए। आप अब कमरे से बाहर आइए। भाभीजी को आराम करने दीजिए। मुझे लगता है कि हम औरतों को ही आरती भाभीजी से बात करनी होगी।
भावना की यह बात सुनकर जय थोड़ा झेंपता हुआ सा कमरे से बाहर आ गया है। डाइनिंग टेबल पर अभी फिलहाल सिर्फ़ घर के पुरुष ही बैठे हुए हैं। क्योंकि सभी बच्चे तो स्कूल कॉलेज जा चुके हैं और घर की महिलाएं आज थोड़ा रुककर नाश्ता करेंगी। डाइनिंग टेबल पर यश वर्धन ने जय से पूछा,
"जय बेटा, आशा करता हूं कि आरती बहू अब बेहतर होगी! क्या तुमने उससे उसकी परेशानी की वजह पूछी?
जय: हाँ पापा। मैंने आरती से बहुत प्यार से उसकी परेशानी की वजह पूछी थी। लेकिन वह बहुत बहकी बहकी बातें कर रही थी। मुझसे अजीब अजीब सवाल कर रही थी।
यश: कैसे सवाल जय बेटा?
जय: बस वही पुराने घिसे पिटे सवाल कर रही थी, जो हर खुशहाल जीवन जी रहीं गृहणियाँ बेचैन होकर पूछने लग जाती हैं। मैं कौन हूं?...मेरा अस्तित्व क्या है?...वगैरह वगैरह।
विजय: अच्छा, मैं अब समझा। आरती भाभीजी को मेरी बीवी की एकेडमी खुलने के बाद से अपने अस्तित्व की तलाश हो रही है।
धनंजय (हँसते हुए): विजय भैया, शायद आपने भीे वह कहावत सुनी होगी...खरबूज़ा खरबूज़े को देखकर रंग बदलता है। आरती भाभीजी को अब बुढ़ापे में क़दम रखते हुए अपने वजूद की तलाश हो रही है।
अजय: लेकिन अब जबकि आरती भाभीजी उम्र के इस पड़ाव पर हैं और उनकी दो बेटियाँ हैं, जो कि अब जवान हो चुकी हैं। इस दौर में आरती भाभीजी को नव्या और भव्या के भविष्य की चिंता करनी चाहिए। वे अपने वजूद को तलाश रही हैं। मैं हैरान हूं।
संजय (हँसते हुए): आरती भाभीजी को अचानक हो क्या गया है जय भैया? उनसे कहिए कि मेरी देविका से थोड़ी सी प्रेरणा लेकर अब वे भी पूजा पाठ में मन लगाया करें। आरती भाभीजी की उम्र में उनको यही सब करना शोभा देता है।
जय: इन औरतों का कुछ कह नहीं सकते हैं। अच्छी ख़ासी चलती हुई ज़िंदगी में अचानक अपने वजूद की याद आ गई है। चलो, देखते हैं। शाम को बात करता हूं आरती से, कि वह क्या चाहती है।
इन्हीं सब बातों में सभी पुरुषों का नाश्ता ख़त्म हो गया है। फिर ये सभी पुरुष एक बार फिर से घर में माैजूद सदस्यों से मिलकर ऑफ़िस जाने के लिए निकल गए हैं। पुरुषों के जाने के बाद आरती का नाश्ता तो उसके कमरे में भिजवा दिया गया है। बाक़ी महिलाएं डाइनिंग टेबल पर नाश्ता करने के लिए बैठ गई हैं।
नाश्ता करते हुए सभी महिलाओं ने तय किया है कि आज चाँदनी और ईशा अपनी एकेडमी से छुट्टी ले रही हैं। फिर उन्होंने तय किया है कि दोपहर में खाने के बाद सभी महिलाओं का अंताक्षरी खेलने का कार्यक्रम किया जाएगा। इससे आरती का मन भी बहल जाएगा और शायद बातों बातों में आरती की परेशानी की वजह भी पता चल जाएगी।
अब दोपहर हो चली है। दोपहर के खाने के लिए घर की सभी महिलाएं डाइनिंग टेबल पर इकट्ठा हुई हैं। आरती को भावना ज़ोर देकर उसके कमरे से बाहर निकालकर डाइनिंग हॉल में सबके साथ खाना खाने के लिए मनाकर ले आई है।
अब सभी महिलाएं डाइनिंग टेबल पर खाना खाते हुए बातें कर रही हैं। लेकिन आरती बिल्कुल चुप होकर रुक रुककर खाना खा रही है। सभी महिलाएं यह सब नोटिस कर रही हैं।
अब दोपहर का खाना ख़त्म होने के बाद तयशुदा कार्यक्रम के अनुसार ईशा ने कुछ बोलना शुरू किया है। ईशा जो बात बोलने वाली है, वह बात आरती के अलावा सबको पता है। (क्रमशः)
