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Surya Rao Bomidi

Others

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Surya Rao Bomidi

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जिंदगी

जिंदगी

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दोपहर का समय था मैं बरामदे में टहल रहा था मुझे भोजन के बाद अपने बरामदे में टहलने की आदत है। मौसम कुछ सुहाना सा लग रहा था, शायद सूरज भी रोशनी बांटते बांटते थक सा गया हो कहीं धूप कहीं छांव, तभी मेरी नजर मेरे दरवाजे पर एक भिखारी पर गया, हाथ में कटोरा, बगल में लटका हुआ एक फटा पुराना झोला, मैला सा पैजामा कुर्ता जैसे कई दिनों से नहीं धुला हो। और जैसे ही मेरी नजर उस पर पड़ी वो कहने लगा "भूखा हूं साहब कुछ खाने को दे दो"

मै अंदर जा कर पूरा किचन छान मारा पर कुछ नहीं मिला। वापस आ कर मैंने कुछ पैसे अपनी पर्स से निकाल कर उस भिखारी को दिए। 


वह भिखारी खुशी खुशी दूसरे घर तरफ चला गया। मैं सोचने लगा कि ऊपर वाले ने भी क्या दुनिया बनाई है कोई भूखा है तो किसी के पास बेइंतहा पैसा है। मैं खाना पचाने के लिए टहल रहा हूं और वो भूख मिटाने के लिए भटक रहा है।


मेरे घर के ठीक सामने मुकेश जी का बंगला है, इनका खुद का होल सेल कपड़ों का दुकान शहर के मुख्य बाजार में है। दुमंजिला मकान, घर के मुख्य द्वार पर सुरक्षा गार्ड, गार्डन में हर किसी को घूरता एक खतरनाक सा दिखने वाला कुत्ता, घर पर दो बड़ी गाड़ियाँ, सब कुछ इनके शानदार रहन सहन को दर्शाता हुआ।


तभी मुझे सामने के बंगले से कुत्ते के भौंकने की आवाज आई, मैं बाहर निकल कर देखा तो मुकेश जी का कुत्ता उस भिखारी पर झपट रहा था, भिखारी किसी तरह अपने आप को बचाने कि कोशिश कर रहा था। कुत्ते ने भिखारी को बुरी तरह से घायल कर दिया। मैं दौड़ कर बाहर निकला तब तक उनका सुरक्षा गार्ड अपने कुत्ते को पकड़ कर अंदर ले गया। तभी एक महिला की आवाज आई देखा तो सामने मुकेश जी की घरवाली अपने गार्ड से कह रही थी


"गणेश जल्दी गाड़ी निकाल और 

देख गणेश चार्ली को जल्दी से ले जा कर इंजेक्शन लगवा दे वरना जहर फैल जाएगा। "

गार्ड चार्ली को ले कर घायल भिखारी के बगल से गाड़ी में निकल गई। भिखारी कभी उस गाड़ी को तो कभी अपने जख्मों को देखता हुआ अपने जख्म सहलाने लगा।



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