जब सियार बना शेर
जब सियार बना शेर
कहलू सियार ने अपने पूर्वज रंगे सियार की कहानी पढ़ी और सुनी थी। उसमें एक सियार गलती से एक धोबी के घर में नील से भरे बड़े बर्तन में गिर कर नीले रंग का हो जाता है। वह सबको कह देता है कि भगवान ने उसे जंगल का राजा बना कर भेजा है। उसके विशेष रंग को देख कर जंगल के सारे जानवर उसकी बात सच मानकर उसे राजा मानने लगते है किन्तु बाद में उसकी पोल खुल जाती है और वह शेर द्वारा मारा जाता है। यह कहानी कहलू ने अलग अलग जानवरों के मुख से अलग अलग ढंग से सुनी थी। कुछ लोग इसे सियारों का मज़ाक बनाने और अपमानित करने के लिए उस अंदाज में सुनाते तो कुछ हंसी मज़ाक के रूप में सुनाते। गधा उसे इस तरह मजेदार तरीके से सुनाता था कि उसे जंगल में घुस कर हरी और ताज़ी घास खाने की छूट मिली हुई थी। राजा शेर सिंह भी उसे देख लेता तो उससे रंगे सियार की कहानी सुनाने को कहता। शेर को गधा उस कहानी को कॉमेडी बनाकर सुनाता और शेर गधे से वह कहानी सुन कर खूब हँसता। फिर वह कहता, " हर एक को अपनी खाल में ही रहना चाहिए।"
कहलू सियार के मन में ख्याल आता कि थोड़े दिनों के लिए ही सही उसका पूर्वज जब जंगल का राजा बना होगा तो कितना मजा आया होगा। कैसे ठाठ रहे होंगे। उसने कल्पना में अपने आप को राजा शेर की जगह और शेर को अपने सेवक के रूप में देखा । उसे बहुत मजा आया और वह अकेला ही बड़ी देर तक हँसता रहा। उसके एक चाचा जंगल के बाहरी किनारे पर गाँव के समीप रहते थे। उनके लडके टहलू ने कहलू को बताया था की गाँव के बाजार में सभी जानवरों की वेश भूषा नकली खालों से बनी हुई मिलती हैं। उसने सोचा,ये धोखा धड़ी के लिए और भी उपयुक्त होंगी ।
उसे शरारत सूझी। मजे के चक्कर में वह यह भी भूल गया कि नकली राजा बने सियार की पोल खुलने पर उसका क्या परिणाम हुआ था। उससे रहा नहीं गया। वह उसी समय टहलू के घर गया।
उसने टहलू से कहा ",मुझे शेर का मुखौटा और उसकी नकली खाल की पोशाक चाहिए?"
टहलू ने पूछा ,"वो तो मैं ला दूंगा मगर तुझे वह क्यों चाहिए ?"
कहलू ने जवाब दिया,"जंगल के जानवरों को बुद्धू बनाएंगे। राजा बन कर मौज करेंगे। "
टहलू ने कहा,"असली राजा तुम्हें देखते ही कोई शत्रु समझ कर टूट पड़ेगा और तुम्हैं मार डालेगा। "
कहलू थोड़ी देर सोच कर बोला ,"मैं उसके सामने नहीं जाऊँगा। दूसरे जानवरों को बुद्धू बनाऊंगा।मजा आएगा। "
टहलू ने कहा शेर का मुखौटा और ड्रेस तो मेरे पास है। थोड़े दिन पहले मुहल्ले में एक नाटक के लिए ली थी। वह मैं तुम्हें दे दूंगा।
उसने घर के अंदर से शेर की ड्रेस लाकर कहलू को दे दी।
कहलू ने उसे पहन कर देखा था । उसके माप की ही थी। फिर उसने उसे पहने हुए ही वापस जाने का विचार किया।
उसने टहलू को बोला, "मैं इसे पहन कर ही चला जाता हूँ।"
टहलू ने कहा, "जैसी तेरी मर्जी किन्तु शेर से बच के रहना।"
कहलू शेर बना हुआ जंगल में चला जा रहा था। उसे देखते ही रास्ते में मिलने वाले जानवर दुम दबा के भाग जाते थे। कोई डर के मारे चीखते हुए भाग रहे थे।
अचानक पीछे से बन्दूक चलने की आवाज आयी। कहलू ने पीछे मुड़ कर देखा । दो शिकारी थे।
ये जानवरों को मार कर उनकी खाल का व्यापार करने वाले गिरोह के सदस्य थे। शेर की खाल ज्यादा दाम में बिकती थी और उसके नाखून और दांत के भी अनेक खरीदार थे। अतः जब उन्होंने कहलू को देखा तो उसके पीछे पड़ गये। कहलू जंगल की घास और पेड़ों की आड़ में छुपता छुपाता जान बचा कर भागा और किसी तरह बच कर घर पहुंचा। उस समय घर में कोई नहीं था। उसने पहुँचते ही शेर का मुखौटा और पोशाक उतार कर एक कोने में छुपा दी और खुद भी एक कोने में दुबक कर बैठ गया। थोड़ा सुस्ताने के बाद वह घर के बाहर निकला तो देखा टहलू आ रहा था।
उसने कहा, "मैं ये बताने आया था कि आज जंगल में शिकारी घूम रहे हैं आज शेर न बनना।"
कहलू बोला, "आज तो क्या मैं कभी किसी को बुद्धू बनाने के लिए नकली शेर नहीं बनूँगा । ऐसी शरारत ही नहीं करूंगा।
राजा शेर ठीक ही कहता है, "अपनी खाल में ही रहना ठीक है। "
