Moumita Bagchi

Others


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ईर्ष्या

ईर्ष्या

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दो समान उम्र की बहनों के बीच जहां प्यार और बहनापा खूब देखने को मिलता है वहीं कुछेक संबंधों में आपसी द्वेष, ईर्ष्या और जलन की भावना भी बढ़चढ़कर मिलती है, जो समय के साथ कम होने के बजाय और बढ़ने लग जाती है। ऐसी ही कुछ स्थिति मधुपर्णा और मधुछंदा के बहनापे की भी थी। ईर्ष्या का जो बीज बचपन में बोया जा चुका था वह समय के साथ केवल परिपक्वता धारण करता रहा। दोनो में मधुपर्णा बड़ी थी। सांवली और कुछ लंबी सी और सबकी लाडली! लेकिन दो वर्ष बाद उसकी बहन सुंदर और सलोनी, मधुछंदा का जब जन्म हुआ तो परिवारवाले उसे ही ज्यादा प्यार करने लगे। वैसे भी भाई-बहनो में जो सबसे छोटा होता है वह माता-पिता के अधिक स्नेह का पात्र हुआ ही करता है। लेकिन इसबात को मधुपर्णा का हृदय कैसे स्वीकार करता? उसका तो मानो सारा राजपाट ही आंखों के आगे ध्वस्त हो गया था। परिवार के स्नेह से वंचित उसके बालमन में अपनी छोटी बहन के प्रति ईर्ष्या के बीज बोने के लिए मिट्टी तैयार हो गई थी। बहरहाल, दोनो लड़कियाँ पढ़-लिखकर सयानी हो गई और शादी के लायक हो गई। बड़ी मधुपर्णा कुछ ज्यादा होशियार थी। मां बाबूजी की तारीफ की भूखी वह हमेशा अपनी बहन से पढ़ाई में आगे रहती थी। वह एम॰ए॰ तक पढ़ी और उसके लिए एक अच्छा सा आई ए एस अफसर का रिश्ता आया तो बाबूजी ने वहीं शादी करा दी। इसके दो वर्ष बाद मधुछंदा की भी शादी हो गई। उसका पति आई आई टी का इंजीनियर था और किसी प्राइवेट फार्म में जाॅब करता था। मधुछंदा अभी शादी नहीं करना चाहती थी और आगे पढ़ना चाहती थी।परंतु अपनी शादी के बाद मधुपर्णा बहन की शादी हेतु माॅ बाबूजी पर दवाब डालने लग गई थी। और उसका शादी करवाकर ही चैन की साॅस ली। उसे डर था कि मधुछंदा कहीं उससे ज्यादा पढ़ लिख न जाए!! शादी के एक वर्ष बाद मधुछंदा को जुड़वा बेटियाॅ हुई। वे दोनों पढ़ने में बहुत तेज थी। परंतु बड़ी बहन मधुपर्णा को लंबे समय तक संतान सुख न मिल पाया था। फिर शादी के कोई आठ वर्ष बाद उसे पुत्रप्राप्ति हुआ। जिसदिन उसके पुत्र का जन्म हुआ, मधुपर्णा का आनंद से सीना कुछ और चौड़ा हो गया। अब वह एक बेटे की माॅ थी, अपनी बहन पर खूब रौब जमा सकती थी!!


वर्तमान में छोटी मधुछंदा की दोनो बेटियाॅ आज इंजीनियर बन गई। बड़ी बेटी मधुरा हायर स्टॅडीस के लिए अमरीका जाना चाहती थी। येल यूनीवर्सीटी में उसका चयन हुआ। परंतु प्राइवेट फाॅर्म में काम करने वाले उसके मध्यवर्गीय पिता के पास इतने पैसे न थे कि वे उसका सारा खर्चा वहन कर सकें। मधुरा ने बैंक से शैक्षिक लोन के लिए आवेदन किया। अब उसे एक गारंटर की जरूरत पड़ी। मौसा जी मधुरा को बचपन से ही बहुत प्यार करते थे। उसे अपनी बेटी मानते थे। उनके खुद के बेटे तो बाद में हुए थे, उससे पहले वे अपनी साली की दोनो बेटियों पर अपना जान छिड़कते थे। वे दोनों थी भी इतनी ही प्यारी

आज, इतने वर्षो बाद भी उनके स्नेह का वह दरिया सूखा नहीं था। मधुरा के लिए मौसा जी ही आखिरी भरोसा थे। उसने उनसे उसका गारंटर बनने का अनुरोध किया। इससे पहले कि मौसा जी कुछ कह पाते उसकी सगी मौसी ने उन्हें ऐसे करने से रोक लिया। छोटी की बेटी की इतनी तरक्की मधुपर्णा से देखा न गया। उन्होंने सोचा कि अगर मधुरा को कोई गारंटर नहीं मिलेगा तो वह अमरीका न जा सकेगी। न नौ मन तेल होगा और न कभी राधा नाचेगी!! मधुरा का वह साल बरबाद हो गया। मौसी की ईर्ष्या ने उसके उच्च शिक्षा पाने के सारे सपनों को चूर चूर कर दिया ।

उसने नौकरी कर ली। वहां उसका परिचय एक मलयाली लड़के के साथ हुआ। बाद में दोनों प्रेम के बंधन में बंध गए। मधुछंदा और उसके पति को बेटी मधुरा के चयन पर भयानक आपत्ति थी। एकदिन चेरियन मधुरा को अपने माता -पिता से मिलवाने घर ले गया। वहां मधुरा के अधूरे सपने की चर्चा चली। उसके होनेवाले ससुर जी को जब पूरी घटना का पता चला तो उन्होंने कहा, " बेटा तुम फिर से एकबार अप्लाई करो। मैं तुम्हारा गारंटर बनूंगा।" होने वाली सासु मां ने भी इस बात पर सहमति जताई।वे एक बैंक में जाॅब करती थी। उन्होने कहा, " हम लोग आखिर कमाते किस दिन के लिए ? पैसे कभी बच्चों के काम आएंगे, इसीलिए ना?" अगले वर्ष मधुरा येल पढ़ने जा पाई थी। और उसके छः महीने बाद चेरियन भी अमरीका आ गया। उन दोनों ने शादी कर ली। और अभी उनका एक प्यारा से बेटा भी है। मधुरा द्वारा भाषा और जाति से परे जाकर शादी करने के कारण हुए अपराध की


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