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Ratna Sahu

Children Stories Inspirational

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Ratna Sahu

Children Stories Inspirational

हिंदी तो सबको आती है।

हिंदी तो सबको आती है।

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हर साल की तरह इस बार भी स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में सोसाइटी में बच्चों के लिए प्रतियोगिता रखी गई। जिसमें डांस, गाना, कविता, स्पीच, खेलकूद के साथ और भी तरह-तरह की प्रतियोगिता रखी गई। जिसमें बहुत बच्चों के साथ मेरी बेटी ने भी बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। सबने सुंदर-सुंदर प्रस्तुति दी।


अब बारी थी मेरी 10 वर्षीय बेटी आशी की।वो फ्रीडम फाइटर्स के ऊपर अंग्रेजी में अपना स्पीच देने वाली थी। उसे सुनने के लिए मैं बहुत ज्यादा उत्साहित थी। तभी उसकी आवाज मेरे कानों में पड़ी।


"यहां पर उपस्थित सभी श्रेष्ठ जनों को मैं सादर अभिवादन करती हूं।" अपनी बेटी के मुंह से यह पहला वाक्य हिंदी में सुनते ही मेरी भौंहें तन गईं।


"अरे! यह तो अंग्रेजी में बोलने वाली थी फिर हिंदी में क्यों बोल रही है? यहां सब बच्चों ने अंग्रेजी में बोला तो ये हिंदी में? नहीं चाहते हुए भी मेरे चेहरे पर नाराजगी साफ झलक रही थी जो शायद अगल-बगल में बैठे लोग भी महसूस कर रहे थे।


"अच्छा बोल रही है आपकी बेटी!" बगल में बैठी एक महिला ने कहा तो मैंने अपना हाव-भाव बदलकर मुस्कुराते हुए हां में जवाब दिया। फिर ऐसा लगा मानो वह महिला तारीफ नहीं बल्कि मेरा मजाक उडा़ रही हो।


तभी मैंने देखा कुछ और भी लोग आपस में खुसुर फुसुर कर रहे हैं, बार बार मेरी तरफ देख रहे हैं। मुझे समझते देर नहीं लगी कि ये सभी मेरे और मेरी बेटी के बारे में ही बातें कर रहे हैं। यह देख अपनी बेटी के प्रति मेरी नाराजगी थोड़ी और बढ़ गई।


हे भगवान! जो भी इज्जत मैंने कमाई थी वो सब गया।खैर उसने अपना भाषण खत्म किया। तालियों की गड़गड़ाहट गूंज उठी। सबने मेरी बेटी के भाषण और उसके हिंदी को बहुत सराहा। "तुमने बहुत अच्छा बोला बेटा! बहुत अच्छी हिंदी है तुम्हारी।"

खुशी के मारे उसका चेहरा चमक पड़ा।पर, मेरा मन अभी भी अशांत था। बिटिया वहीं दोस्तों सब के साथ बातें करने लगी और मैं घर आ गई। यूं तो इस बार भी उसे बहुत वाहवाही मिली। पर, मुझे रह-रहकर पिछले साल वाली स्पीच और सब की तारीफ याद आ रही थी।


कार्यक्रम खत्म होने के उपरांत जैसे ही बिटिया घर आई मैंने उसकी बांह पकड़ झिड़कते हुए कहा।


"तुम इतनी अच्छी अंग्रेजी जानते हुए भी हिंदी में क्यों बोला? तुम्हें पता भी है महीनों पहले से मैंने इतना लंबा चौड़ा स्पीच तैयार किया कि तुम बोलोगी और तुमने क्या किया हिंदी में बोला। आखिर क्यों? तुम्हें याद है जब पिछली बार तुमने अंग्रेजी में स्पीच दिया तो सबका मुंह कैसे खुला रह गया था? सब कितनी तारीफ कर रहे थे तुम्हारी और मेरी भी। अरे! कईयों ने तो घर आकर मुझसे पूछा, कैसे बेटी को पढ़ाते हो? इतना सब सिखा पाते हो? बहुत अच्छा बोलती है। यूं तो हमारे बच्चे भी इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ते हैं पर, इतनी अच्छी अंग्रेजी नहीं है उसकी।

अरे शहर के टॉप स्कूल में पढ़ाती हूं लाखों में फीस देती हूं। इसलिए, नहीं कि कहीं भी हिंदी में बोलना शुरू कर दो। तुझे पता है वह कुहू की दादी मेरा हाथ पकड़ बोल रही थी। कुछ टिप्स मेरी बहू को भी दिया करो ताकि वे भी अपने बच्चों को तुम्हारे बच्चों के जैसे बना सके। सच कहती हूं कुछ दिनों तक तो सोसाइटी में हम दोनों चर्चा का विषय बन गए थे, हर जगह हम दोनों की ही बातें होती थी। हमारा स्टेटस हाई हो गया था। तुम्हें तो फर्स्ट प्राइज भी मिला था तो फिर क्यों तुमने हिंदी में बोला? हिंदी तो सबको आती है बेटा!"


"बस इसीलिए मां! इसलिए हिंदी में बोला। ताकि मैं जो बोल रही हूं वह सब सुन सके, समझ सके।"


"क्या..? तुम क्या कहना चाह रही हो..?"


"यही कि मैंने जो पिछली बार अंग्रेजी में स्पीच बोला तो सबको बस इस बात की खुशी और आश्चर्य हुआ कि मैं अंग्रेजी में बोल रही थी। मैंने क्या कहा? क्या बोला? यह कुछ लोगों को ही समझ आई। बहुत से लोग नहीं समझ पाए। वे तो बस इसीलिए ताली बजा रहे थे कि मैं अंग्रेजी में बोल रही थी। और इसका एहसास मुझे तब हुआ जब मेरी एक दोस्त ने बताया कि अरे! तुमने कितनी अच्छी अंग्रेजी बोली। मुझे तो ज्यादा कुछ समझ में नहीं आया। पर हां, तुम्हारी अंग्रेजी सुनकर मेरे घर वालों को बहुत आश्चर्य हुआ। सभी यही बोल रहे थे कि तुम भी इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ती हो लेकिन तुम्हारी अंग्रेजी कहां इतनी अच्छी है? सच कहती हूं। तुम कैसे इतना अच्छा बोल लेती है जरा मुझे भी बताओ ना? और तो और जब अपने घर में काम करने वाली राधा दीदी आई तो उन्होंने भी यही कहा।

"बेटा, तुमने जो भी बोला मेरे को तो समझा नहीं लेकिन हां, अंग्रेजी बोलते देख मेरे को बहुत खुशी हुई, आश्चर्य लगा। मैं तभी समझ गई कि मुझे अपनी बातें दूसरों तक पहुंचाने के लिए अंग्रेजी नहीं हिंदी में बोलना है। मां, आपको नहीं लगता अपनी बातों को घर-घर और जन जन तक पहुंचाने के लिए हिंदी से अच्छी, सरल और मधुर कोई और भाषा नहीं हो सकती। पता है मम्मी मैंने अगले ही दिन अकेले में बैठकर हिंदी में कुछ पंक्तियां बोलने की कोशिश की लेकिन यह क्या.! मैं तो अच्छे से बोल ही नहीं पा रही थी। फिर जब अगले दिन हिंदी क्लास में टीचर जी ने पूछा,

"कारक के कितने भेद हैं?"

किसी को जवाब नहीं आया।

"संधि विच्छेद क्या है?" ये भी किसी को समझ नहीं आया। तब टीचर जी ने गुस्से में कहा, "माना कि आगे बढ़ने के लिए अंग्रेजी बहुत जरूरी है पर इसका मतलब यह नहीं कि तुम अपनी मातृभाषा को भूल जाओ। तब मुझे भी लगा सच में, अंग्रेजी सीखने के चक्कर में तो मैं अपनी मातृभाषा ही भूलती जा रही हूं। पता है मम्मी सिर्फ मैं ही नहीं मेरी कक्षा में और भी मेरे दोस्त हैं जो अंग्रेजी के साथ और भी अलग-अलग तरह की भाषाएं सीख रहे हैं पर उन सबको अच्छे से हिंदी में बोलना, लिखना नहीं आता है। परीक्षाओं में भी बाकी सभी सब्जेक्ट में पूरा का पूरा नंबर आ जाता है लेकिन हिंदी में कभी नहीं आता। मतलब सब का हिंदी में डिब्बा गोल होता जा रहा है। मैंने तभी सोच लिया कि मैं सबसे पहले अपनी हिंदी सुधारूंगी।और अब की बार जो प्रतियोगिता होगी तो मैं सिर्फ और सिर्फ हिंदी में बोलूंगी। आपने देखा ना मम्मी। सब कितने गौर से मेरी बातें सुन रहे थे। मुझे ऐसा लगा कि मैं जो बोल रही हूं, जो कहना चाह रही हूं वह बच्चों से लेकर बड़ों तक सब आसानी से समझ रहे थे, सारी बातें उनके हृदय में उतर रही थी। और मेरा यही तो उद्देश्य है मां कि मैं अपनी बातें दूसरों तक पहुंचाऊं। मां, अगर मुझे पुरस्कार नहीं भी मिले तो मुझे कोई दुख नहीं होगा। मुझे तो बस इसी बात की खुशी है कि मैंने जो कुछ भी कहा सब ने मेरी बातें सुनी, सब को समझ में आई। आप देखना मां, पिछली बार से भी ज्यादा इस बार लोग हमारी तारीफ करेंगे।"


बेटी की बातें सुन मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। उसकी कही हर एक बात सही थी। सच में अंग्रेजी जरूरी है पर, इसके चक्कर में हमें अपनी मातृभाषा नहीं भूलनी चाहिए। अंग्रेजी में बोलना हमारा स्टेटस दिखाता होगा लेकिन हिंदी में बातें करने से तो एक अलग ही अपनेपन का भाव उत्पन्न होता है।


"क्या हुआ मां आप क्या सोचने लगी।"


"कुछ नहीं बेटा, आपने बिल्कुल सही कहा अगर हमें लोगों के दिलों तक आसानी से अपनी बात पहुंचानी हैं तो हिंदी से बेहतर और कोई भाषा नहीं हो सकती। इसीलिए तो कहते हैं हिंदी की बात ही कुछ खास है।"


"आपने वीडियो तो निकाला न मां। चलो दिखाओ ना। जरा सुनूं तो मैं कैसे बोल रही थी?"


मैंने जैसे ही अपना मोबाईल निकाला तो बेटी के दिए गए भाषण के वीडियो और बधाई के अनेकों संदेश थे। सबने यही लिखा था तुम्हारी बेटी की हिंदी ने तो दिल जीत लिया, मन मोह लिया। कितनी अच्छी हिंदी बोलती है।


अगले दिन जब राधा काम करने आई। तो सबसे पहले बिटिया के सिर पर हाथ रखते हुए यही कहा ,

"पता है दीदी, कल जो बिटिया बोली मेरे को तो सब समझ में आया, बहुत अच्छा लगा। पिछली बार भी अच्छा बोली पर मेरे को तो अंग्रेजी नहीं समझाता इसलिए कुछ समझ में नहीं आया। पर इस बार तो एक-एक बातें समझ में आई। बहुत बधाई बिटिया! ऐसे ही आगे बढ़ो और खूब नाम कमाओ।"


सुनकर तो मेरे सिर से अंग्रेजी का भूत उतर गया। सच में इस बार की बधाइयां तो पिछले साल से भी ज्यादा खुशी और सुकून दे रही थी।



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