STORYMIRROR

Amitosh Sharma

Children Stories Inspirational Others

4  

Amitosh Sharma

Children Stories Inspirational Others

गणेश का आध्यात्मिक दर्शन

गणेश का आध्यात्मिक दर्शन

5 mins
9

समाज बस गणेश चतुर्थी को एक अन्य धार्मिक त्योहार की तरह कर्मकांड के तराजू पर तौलता आया है। हम बच्चों को विरासत में बस वही कर्मकांडी सोच थोपते जाते हैं।
पूछो कभी खुद से, इससे क्या सुकून मिल गया? क्या गणेश का एक भी अंश तुम्हारे अंदर आया?
तो उत्तर मिलेगा - नहीं।
हम बस पूजा-पाठ, भजन-कीर्तन, मोदक और लड्डू की बाहरी चकाचौंध में पागल होकर गणेश को गंगा में बहा आते हैं और जिंदगी वापस वैसे ही चलने लगती है।

सुनो पार्थ, ज्ञानी कहते हैं गणेश का सीधा अर्थ ज्ञान से है।
'गणेश' शब्द 'गण' (समूह) और 'ईश' (स्वामी) से मिलकर बना है।
अब इसका अगर आध्यात्मिक अर्थ निकालें तो कुछ ऐसा होगा -
मानव मन या तन बहुत सारे पापों का समूह (गण) है और हमारी चेतना या आत्मा, इस पापी मन या तन की स्वामी (ईश) होती है। अब जिसका स्वामी जैसा होगा, वो अपने मन को वैसे ही घसीटेगा।

इसको गणेश की मूर्ति-पूजा के प्रतीक से भी देखा जा सकता है। गणेश की सवारी छोटा मूषक है, यानी हमारे मन और तन की हर वो छोटी सोच जो हमसे रोज 100 पाप कराती है। पर हम उस छोटे से चूहे को वश में नहीं कर पाते। वो हमें गंदे नाले का कीड़ा बनाकर रेंगने पर मजबूर करता रहता है। हम बस उसकी कठपुतली बनकर रेंगते और बदबू करते रहते हैं, फिर भी हम पूजा नहीं छोड़ते, कर्मकांड नहीं त्यागते।
मेरी बात कड़वी जरूर है पर सच है। मन से अपने अंदर झांकोगे तभी ये सच अपनाओगे, वरना जैसे चल रहे थे वैसे ही बेहोश होकर मंदिर जाओगे, गणपति बप्पा मोरया रट-रट कर नाचोगे, पुजारी जी पूजा के नाम पर 100 कर्मकांड करवाएंगे और तुम खुश होगे कि गणेश चतुर्थी सफल हो गयी।
पर फिर जब कर्मकांडी नशे से होश में आओ तो मेरी एक बात खुद से पूछना कि क्या सच में गणेश आपकी जिंदगी में आए या उनको मूर्ति के साथ वहीं गंगा में बहा आए?

तब अगर उदास हो जाओ तब मेरे बताए आध्यात्मिक गणेश की पूजा करना।
गणेश मतलब वो जो तुम्हारे छोटे पापी चूहे का सारथी होगा, मतलब तुम्हारे भटकते मन और पाप करते तन का स्वामी होगा,
अर्थात तुम्हारी शुद्ध चेतना।
और जैसे गणेश अपने उस मूषक पर सवार होकर पूरा ब्रह्मांड घूम आते हैं, वैसे तुम भी दुनिया का हर मुकाम हासिल कर पाओगे।
और ऐसी पूजा के लिए न पैसा खर्च होता है न पुजारी का टैक्स लगता है, बस अपने अंदर के मूषक पर अपना नियंत्रण करना पड़ेगा।
यानी पूजा करो न करो, गणेश बनने का निरंतर प्रयास करना होगा।
और ऐसा करने में तुम सफल होने लगे तब तुमको एक और सवाल का उत्तर मिलने लगेगा कि हिंदू धर्म के अनुसार गणेश जी की ही पूजा सबसे प्रथम क्यों बताई गई है?
पुराण की कहानी में इसका आध्यात्मिक उत्तर छिपा है पर हम बस बच्चों की तरह कहानी देखकर खुश हो जाते हैं, उसके मर्म से वंचित रह जाते हैं।
आइये आज जब इतना सुना आपने बाबा को तो एक बार आध्यात्मिक दर्शन उस कहानी का भी कर लेते हैं।

जैसा आप लोग कहानी से जानते हैं, आपके जितने देवता थे वो मानो नर्सरी क्लास के बच्चे जैसे लड़ते थे और अंत में जब लड़ाई खत्म होती और निष्कर्ष नहीं मिल पाता तो वो अपने स्कूल के प्रिंसिपल, साक्षात शिव के पास आते थे।
ऐसे ही एक बार वो सारे देवता महादेव के पास इस बात के निष्कर्ष के लिए आए कि किसका वाहन सबसे उत्तीर्ण है?
आप सोचो ऐसे जटिल सवाल सुनकर प्रिंसिपल साहब पर क्या बीती होगी?
ध्यान में मग्न बेचारे महादेव सुनकर बड़े गौरवान्वित महसूस कर रहे होंगे कि वाह रे नर्सरी के बच्चे क्या खूब ज्ञान वाला प्रश्न लेकर आए हो।
पर जैसा कि NEP के तहत टीचर्स को बताया गया है कि बच्चे के प्रश्न को गंभीरता से लेते हुए उसका समाधान बताइये, बेचारे प्रिंसिपल साहब (भोला) भी शायद NEP पढ़ रखे होंगे तो समाधान दिया कि बच्चों, ऐसा करो सब अपने-अपने वाहन पर सवार होकर पूरे ब्रह्मांड का चक्कर लगा कर आओ, जो पहले आएगा वो जीत जाएगा।
बच्चे खुश हो गये, रेस के नाम पर बच्चे वैसे भी खुश हो ही जाते हैं। सारे बच्चे रेस में अपने हवाईजहाज पर सवार होकर कतार में लाइन लग गये और प्रिंसिपल साहब ने सीटी बजा दी, फिर क्या सबकी सवारी दुनिया घूमने निकल पड़ी।
 जब भीड़ खत्म हुई तब प्रिंसिपल साहब की नजर उस मोटे, छोटे, क्यूट से 'ॐ' आकार के बच्चे पर पड़ी जिसे हम गणेश कहते हैं। वो बेचारा किसी गहरी आध्यात्मिक सोच में बस अपने वाहन छोटे से मूषक को घूर रहा था या कोस रहा होगा कि रे मूषक, तुझसे ब्रह्मांड छोड़ो रास्ते का एक गड्ढा भी पार हो?
और महादेव ने शायद जान बूझकर आज हस्तक्षेप या कोई सस्ता उपाय न दिया, शायद वो आज गणेश का आध्यात्मिक टेस्ट ले रहे थे ताकि उसको जिंदगी का एक महंगा परमानेंट उत्तर मिल जाये। और आपको पता है उस ज्ञानी बच्चे ने अपने ज्ञान का क्या खूब इस्तेमाल किया था।
न वो अपनी कमजोरी (मूषक वाहन) के लिए रोया न खुद को हतोत्साहित होने दिया, बल्कि अपनी चेतना की गहराई से उस वाहन पर सवार होकर अर्थात अपनी कमजोरी को ही हथियार बनाकर महादेव के चक्कर काट कर सामने क्यूट सी आवाज में बोलता है - मैं आ गया। महादेव मन ही मन मुस्कुराए और पूछा पूरी सृष्टि घूम लिए? गणेश जी बोले हे बापू क्यों बच्चे की जान ले रहे हो, प्रिंसिपल साहब क्यों टेस्ट पर टेस्ट ले रहे हो बस भी करो। जो खुद पूरे ब्रह्मांड का मालिक हो, शुद्ध चेतना का सागर हो उसके चक्कर न लगाकर मैं भी भला बाकी सामाजिक पुजारी की तरह मंदिर, मस्जिद, चर्च और गुरुद्वारे में भटकूं?
आप ही मेरी सृष्टि, दुनिया, ब्रह्मांड, संसार सब हो और मैंने आपका चक्कर लगा लिया, अब आगे आप जानो मैं हारा या जीता?

कहानी कहती है तब तक सब आ चुके थे, सबने देखा और सार्वजनिक घोषणा हुई कि ज्ञान से बढ़कर कोई वाहन नहीं हो सकता।
बड़े से बड़े ब्रह्मास्त्र का प्रयोग भी ज्ञान के अभाव में विफल है,

इसलिए "ज्ञान की पूजा किसी भी कार्य में सबसे प्रथम होनी चाहिए" ताकि कोई भी कार्य सफलता से संपन्न हो जाये।

तो प्यारे, दर्शन मेरा पर निर्णय तुम्हारा कि आज से गणेश की कर्मकांडी पूजा करनी है या खुद को दिन-प्रतिदिन गणेश बनाना है।

इसलिए गणेश चतुर्थी में बोलो : *गणेशोऽहम्*


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन