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Diwa Shanker Saraswat

Children Stories Inspirational

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Diwa Shanker Saraswat

Children Stories Inspirational

दूध का दूध और पानी का पानी

दूध का दूध और पानी का पानी

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  रंगीला कछुआ से दौड़ हारकर चीखू खरगोश बड़ा मायूस था। वैसे चीखू दौड़ने में बहुत अच्छा था। पर जरा आलसी था। इस दौड़ में हार से चीखू को आलस्य छोड़ लगातार लगे रहने की शिक्षा मिलनी चाहिये थी पर चीखू अपनी हार से एकदम ईर्ष्या से जल भुन गया। 


  चीखू ने अपने दोस्तों पीहू खरगोश और स्वीटी खरगोशनी से बात की। 


 चीखू - " मुझे लगता है कि रंगीला ने बेईमानी की है। या हो सकता है कि निर्णायक उससे मिले हुए हों। आपको लगता है कि रंगीला मेरे जैसा तेज दौड़ सकता है।" 


  पीहू - " पर हम सबने देखा था कि रंगीला तुमसे पहले वापस आया था। तुम तो बहुत देर में वापस आये थे। वैसे खरगोश तो हमेशा से तेज दौड़ते हैं। उसमें भी तुम तो सबसे तेज दौड़ते हों। "


  स्वीटी -" चीखू। आखिर तुम्हें कैसे लगता है कि बेईमानी हुई है। और रंगीला तुमसे पहले कैसे आ गया था। "


 चीखू अच्छी तरह जानता था कि वह जंगल में सो गया था। रंगीला ने पूरी दौड़ की थी और उससे पहले वापस आया। अभी तक जानवर इतने चालाक नहीं थे कि बेईमानी की बात सोच सकें। पर अब चीखू के मन में बेईमानी आ गयी। उसने एक अच्छी भली कहानी तैयार कर ली। 


  चीखू -" हुआ यह था कि मैं तो दौड़ने में लगा रहा और रंगीला बीच रास्ते से वापस लौट आया। किसी ने यह जानने की कोशिश भी नहीं की कि बेईमानी हुई है। मुझे तो लगता है कि अकड़ू भालू भी बेईमानी में शामिल है। वह ईमानदारी का ढोंग करता है। महाराज बब्बर शेर उसपर आंख बंद कर भरोसा करते हैं। तभी तो उसे निर्णायक बनाया। पर तालाब के भीतर से कुछ स्वादिष्ठ भोजन रंगीला ने अकड़ू को दिया तो बस फिर क्या। दोनों ने मिलकर बेईमानी कर ली। "


................ 


  चीखू की झूठी कहानी एक खरगोश से दूसरे खरगोश तक पहुंची। सारे खरगोश इकट्ठा हो गये। यह केवल चीखू के साथ अन्याय नहीं है। बल्कि पूरी खरगोश जाति का अपमान है। "महाराज। हमें न्याय दो।" के नारे लगाते खरगोश महाराज बब्बर शेर की गुफा की तरफ बढ लिये। 


  महाराज अभी सोकर जगे थे। गुफा के बाहर बहुत शोर सुनकर बाहर आये। सारे खरगोश एक सुर में रंगीला और अकड़ू की बेईमानी की बात कर रहे थे। महाराज को अकड़ू भालू पर बहुत भरोसा था। पर जनता की राय का भी लोकतंत्र में बहुत मतलब है। 


  महाराज ने मंत्रिमंडल की सभा बुलाई। न चाहते हुए भी अकड़ू भालू को मंत्रिमंडल से हटाना पङा। आखिर जन मत का इतना तो असर होता है। प्रतियोगिता की जांच करने को निष्पक्ष समिति गठित की गयी। पर समिति को निष्पक्ष कैसे कहा जाये। आखिर में बुजुर्ग खरगोश मंगू को समिति का अध्यक्ष बनाया गया। 


  मंगू बहुत इंसाफ पसंद खरगोश था। उसे लग रहा था कि चीखू ने झूठी कहानी बनाई है। सबसे पहले उसने रंगीला के बयान लिये। रंगीला के बयान से मंगू समझ गया कि चीखू प्रतियोगिता बाले दिन रास्ते में सो गया था। रंगीला लगातार दौड़ता रहा। धीरा चलने पर भी जीत गया। आखिर में उसने दूध का दूध और पानी का पानी करने का अलग तरीका निकाला। 


  आज दुबारा प्रतियोगिता होगी। पर इस बार दोनों अलग अलग दौड़ेंगें । पहले चीखू ने दौड़ लगाई। आसमान में चीलों को तैनात किया था। बीच में एक बार फिर चीखू को झपकी आयी। पर थोड़ा रुक फिर से चीखू दौड़ा । इस बार चीखू कोई रिस्क नहीं लेना चाहता। कुल दस मिनट रास्ते में आराम करने के बाद भी चीखू ने पूरी दौड़ पैंतालीस मिनट में कर ली। 


फिर रंगीला ने दौड़ लगाई। धीरे धीरे चलते चलते रंगीला अपनी राह बढता रहा। दौड़ पूरी करने में उसे पूरे छह घंटे लगे। 


चीखू और दूसरे खरगोश खुशी के मारे नाच रहे थे। पर मंगू खरगोश ने घोषणा की कि उस दिन प्रतियोगिता में कोई बेईमानी नहीं हुई थी। रंगीला ही जीता था। इसे प्रमाण सहित सिद्ध किया जा सकता है। 


  महाराज बब्बर शेर ने पूछा - " मंगू खरगोश। वैसे तो चीखू आपकी बिरादरी का है। फिर भी तुम उसके खिलाफ क्यों बोल रहे हो। अभी तो हम सभी ने देखा कि चीखू रंगीला से तेज दौड़ता है। "


  मंगू - " महाराज। मैं सच्चाई का साथ देता हूं। सच्चाई यह है कि उस दिन भी रंगीला को दौड़ पूरी करने में छह घंटे लगे थे। आज भी छह घंटे लगे हैं। चीलों ने आसमान से पूरी दौड़ देखी है। पर चीखू उस दिन छह घंटे में भी दौड़ पूरी नहीं कर पाया। आज पैंतालीस मिनट में पूरी कर ली। चीलों ने यह भी बताया है कि चीखू ने दस मिनट आराम भी किया था। इससे तो सिद्ध होता है कि उस दिन भी चीखू प्रतियोगिता में सो गया था। लगातार चलते रहकर रंगीला कछुआ ने दौड़ जीती थी। "


  फिर मंगू ने चीखू से कहा -" चीखू, तुम्हें तो रंगीला से सीखना चाहिये कि लगातार लगे रहने से बड़े से बड़ा काम हो जाता है। और आलस्य करने से असफलता ही हाथ लगती है। पर यह न करके तुमने तो बखेड़ा खङा कर दिया। दूसरे खरगोशों ने भी सच्ची बात न सोचकर बस अपनी विरादरी देखी। यह पूरा जंगल हमारा घर है। हम सभी जानवर एक दूसरे के भाई भाई हैं। सच्ची बात है कि सभी में कुछ अंतर है। पर किसी के अच्छे प्रयासों को प्रोत्साहित करने के बजाये अपनी जाति का झंडा लेकर उत्पात मचाना कहाॅ की समझदारी है। सभी मिलकर रहेंगे तो जंगल की तरक्की होगी। नहीं तो बर्बादी होने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा। "


  


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