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Dr. Vijay Laxmi"अनाम अपराजिता "

Others

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Dr. Vijay Laxmi"अनाम अपराजिता "

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धापू भाग 9

धापू भाग 9

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कुंवर सा व ठाकुर सा खबर सुनते ही खुशी से झूम उठे कुंवर सा को दिनभर बच्चे के दिवास्वप्न आते क्या होगा ????

लगता की बेटी हो जाए जिसे वे खूब जी भर कर अपना मनचाहा वात्सल्य लूटा सकें । मासा छोरा चाहती अपने घर का कुलवारिस । धापू तो बस अपनी किताबों में खोई रहती । उसे लगता यह सब कैसे ???? अभी दस माह ही तो शादी के हुए हैं मेरी आगे की पढ़ाई का क्या होगा ???? कुंवर सा उस के साथ बैठकर बातचीत करना चाहते पर बस उसे उनका रंग देख ही लिज लिजी वितृष्णा होती । मानव मन का भी कुछ नहीं किया जा सकता ।जो हर तरह से निम्न थे देखकर ठुकरा कर चले जाते वापस लौटकर उत्तर भी ना देते । गोरी चमड़ी का मोह क्या कहे मन को ??कहीं ना कहीं धापू का मन अंदर कुछ चटका जाता।


 कुंवर सा ने दिल की गहराइयों से अंतर्मन से चाहा था ऐसा की एक नजर में ही दीवाने हो गए थे अब क्या कहा जाए प्यार जरूर चेहरा देख कर किया था । उनका प्रेम अशर्त था । पूरा त्याग, समर्पण ,विश्वास का ।


धापू उसने तो शायद अपनी आगे पढ़ने की आकांक्षा के चलते ही समझौते का प्यार किया था ।


मासा ने समझाया भी था धापू यह 1 दिन की बात नहीं है खूब सोच विचार ले अपनी आकांक्षा पढ़ने का जरिया ही मत समझना । सुखी वैवाहिक जीवन के लिए सर्वप्रथम व महत्वपूर्ण आवश्यकता है आत्मिक एकता मन विचारो का सुमेल यही हम मनुष्यों की विशेषता है बाकी तो जानवर भी बच्चे पैदा कर लेवे जीवन भी चला लेवें आदमी ही जीवन भर तन मन धन से एक दूसरे का साथ निभावें। 


धापू भी करती क्या ??? उसने तो शायद कुंवर सा को अपनी आकांक्षा सिद्धि का रास्ता ही माना था । कुंवर सा तो बस एक आराध्या की तरह प्यार किया था । शायद ही कभी अपना हक जताने की कोशिश भी करते तो धापू ऐसा कुछ ना कुछ जरूर बोल देती । 


कुंवर सा यह सब कभी मासा से भी ना जताते । धापू अपने को भी कोसती किस घड़ी में बच्चा आया । कुंवर सा उसका बराबर ध्यान रखते । समय से खाना पीना सब कुछ का ध्यान रखते । वे मासा से बात कर कुछ दिनों को धापू को उसकी मां के यहां भेजने की सोच रहे थे कि शायद उसका मन अपनी मां के यहां बदल जाए ।


कुंवर सा बहुत ही सुलझे आदमी थे उन्होंने धापू की मासा से बात कर बोल दिया अपनी मासा से कहना उचित न लगा । धापू को लेने उसके बापू जी कुंवर सा के कहने से, बिना बताए ही आ गए । धापू मासा के पास रहने को आ गई ।


धापू यहां भी बुझी-बुझी सी रहती उसे यहां भी खुशी ना लगती ।अब उसे कुंवर सा की कमी लगती । यहां तो मासा यही बोलती, "छोरी तू कोई बीमार ना है ठकुराइन बाई सा ने तुझे कुछ अधिक ही लाड़ कर चढ़ा रखा है । हमने भी इतने बच्चे जने हमें तो कोई तकलीफ ना लगी। चल उठ सारा काम पड़ा है मुझे तेरे बापू सा की मदद को खेत भी जाना है । धापू की मां जानती थी धापू को मुझे उल्टा बोलना पड़ेगा तभी कुंवर सा व ठकुराइन सा की कदर लगेगी ।


ठकुराइन सा हमेशा उसके हाल लेती रहती यही कहती मेरी बींदणी का आप ध्यान रखना जी मेरे छोरे का वारिस जनमने वाली है । धापू का मन तो आजकल किताबों में भी नहीं लगता था न जाने किस सोच में डूबी रहती ???  


एक दिन अचानक उसकी सहेली हाँजू (जयन्ती)आ गयी मासा खेत गयी थी बहुत ही खुश हुई उसके अंदर एक आंतरिक खुशी लगी ।धापू को हाँजू के बारे में सब कुछ जानने की इच्छा थी । वह दो भाई से छोटी तीसरे नंबर की थी । उसकी दो भाभी भी आ चुकी थी । घर में सभी चाहते थे। दोनों एक कक्षा में व पढ़ने में एक दूसरे के समकक्ष थी साथ ही दोनों में बहुत ही अच्छे स्तर की प्रतियोगिता थी । बस अंतर था तो आर्थिक स्तर का पर वह दोनो के बीच कभी न आया ।


क्या धापू के मन की गांठ सहेली हाँजू के आने से सुलझ सकेगी ?? जानने के लिए पढ़ें क्रमशः यदि आपको मेरा कहानी लेखन पसन्द आये तो अपने विचार व सुझाव समीक्षा दे अवश्य बतायें ।



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