बोझ
बोझ
उसके सिर पर एक गठरी थी,देखने में वह बड़ी नहीं लग रही थी,लेकिन उसके चलने से लगता था कि उसमें किसी भारी वजन वाला सामान है।वो आहिस्ता आहिस्ता पगडंडी पर आगे बढ़ता जा रहा था।दो आदमी उसके पास आये और उसे रोककर कहने लगे ये थोड़ा सा सामान है इसे भी लेते चलो।उसने उन सामानों को अपने गठरी के ऊपर रख लिया और धीरे धीरे चलने लगा।थोड़ी दूर चला तब तक एक आदमी और आया और बोला ये थोड़ा सा सामान है इसे भी लेते चलो।उसे भी उसने अपनी गठरी के ऊपर रखा और चल दिया।थोड़ी दूर चला तब तक एक और आदमी आया, बोला ये थोड़ा सा सामान है इसे भी लेते चलो।उस आदमी ने उन सामानों को भी अपने सिर पर लदी गठरी के ऊपर रखा,और चलने लगा।अब उसकी गठरी कहीं नजर नहीं आ रही थी दूसरे के सामानों से ढक गयी थी और वह उसी चाल से रास्ता नापता जा रहा था।फिर एक महिला आयीं और उसको कुछ दान करने की गरज से बोलीं बाबा ये कम्बल है,कुछ जाड़े में पहनने के कपड़े हैं, इन्हें ले लीजिये।आप के काम आयेंगे।तब तक एक सज्जन और आये शक्ल सूरत से लेखक नजर आ रहे थे,उनके पास किताबों का बंडल था जो वो लेकर चल नहीं पा रहे थे बोले बाबा मेरी सहायता करो और इन किताबों के बंडल को थोड़ी दूर लेते चलो।किताबों का बंडल भी उसने अपने सर पर रखा और उसी तरह चलने लगा।मैं भीउसके साथ साथ ही चल रहा था। किसी काम बस रुक गया तो देखा उस आदमी ने सारा गट्ठर जमीन पर पटक दिया और लोग उसमें से अपना अपना सामान ढूंढने लगे और वो आदमी भी कुछ ढूंढने लगा।मैंने उससे पूछा क्या ढूंढ रहे हो उसने कहा मेरा सामान ही इन लोगों के सामान में खो गया है।
