भुट्टे वाली आंटी
भुट्टे वाली आंटी
एक बार की बात है जब मैं नौकरी शहर में करती थी । दफ्तर कमरे से 15 मिनट की दूरी पर था। जिसे मैं पैदल गली ऑटो रिक्शा के सहारे तय करती थी। रोज शाम जब दफ्तर छूटने का वक्त होता था तब कुछ ना कुछ बाहर नुक्कड़ या छोटे फट्टों पर कुछ ना कुछ खाने को जी होता था। और दफ्तर के बाहर वाला नुक्कड़ बहुत ही भीड़ भाड़ वाला हुआ करता था।
नौकर के कोने पर एक भुट्टे वाली उम्र में बड़ी थी जो एक आंटी रहा करती थी वह रोज दोपहर तीन बजे से एक रंगीन छतरी लिए उस कोने में आकर अपने भुट्टे सजाया करती थी। और दूसरी तरफ कोने में उसकी दो बेटियां हीना और उजमा कचौड़ी बेचती थी। अक्सर मेरे दफ्तर के लो वहां कचौड़ी खाने जाया करते थे और मैं भी एक दिन भुट्टा खाने के लिए उनके साथ गई। पहली बार जब भुट्टा खाया तो समझ में आया कि उस नुक्कड़ पर इतनी भीड़ क्यों रहती थी।
आंटी की मेहनत और मीठी आवाज सबको अपनी तरफ आकर्षित करती थी। मैं रोज यह नजारा देखने के लिए वहां आधा घंटा बिताया करती थी। और सोचती थी कि आंटी की दोनों बेटियां इतनी छोटी उम्र से ही क्यों मेहनत कर रही थी। मैं रोज कोशिश करती कि उनसे बातें करूं लेकिन आंटी जी इतनी व्यस्त होती थी की मैं उनसे दो महीने तक सही से हाल-चाल पा नहीं जान पाई फिर मैंने सोचा कि क्यों ना हिना या उजमा से इस बारे में कभी बात की जाए। और मैंने धीरे धीरे उनसे दोस्ती करना शुरू किया। और वो बहनें भी रोज मुझे वहांं देर तक खड़ा देखकर बातें किया करती थी। और जैसे जैसे दिन बीतते गए वह मुझे पहचानने लगती और कचौड़ियां खाने का आग्रह करती। और मैं मना भी नहीं कर पाती। क्योंकि मुझे रास्ता चाहिए होता था उनसे बातें करने का। और फिर लंबे समय बाद मैंने एक दिन हिम्मत करके हिना से आखिर यह सवाल कर ही लिया कि वह स्कूल नहीं गई क्या कभी क्या उनका मन पढ़नेे को नहींं करता है तब हिना ने बताया कि उसके पापा इस दुनिया में अब नहीं रहे और उसका बड़ा इकलौता भाई जिसे उसकी मां ने मेहनत करके दसवीं तक स्कूल पढ़ाया था। वह भी प्रेम जाल में फंस रिश्ते के ही किसी लड़की के साथ घर छोड़कर चला गया था। जिससे उन मां को
बहुत ही गहरा सदमा लगा और वह बीमार पड़ गई तभी से उन्होंने मां की दवाइयां और उनके आराम के लिए यह काम करना शुरू किया। और जब कभी भी उनकी पढ़ाई का जिक्र उनकी मां के सामने होता है तो वह बहुत ही बुरी तरीके से अपने आप को नुकसान पहुंचाने लगती और खुद को ही दोषी मानकर वह नकारात्मकता को अपनाती हैं। उस दिन के बाद मैं वहां कभी नहीं गई और सोचने लगी कि दुनिया में वह लोग आज भी हैं जो अपनी रोटी के लिए सिर्फ कड़ी मेहनत और ईमानदारी निभाते हैं।
