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Sheela Sharma

Others


4.1  

Sheela Sharma

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भोर की पहल

भोर की पहल

6 mins 169 6 mins 169

कनिका के मन में द्वंद मचा था क्या वह अपने मन की बात उजागर करें लोग उसे समझेंगे कहीं सुनकर खिल्ली तो नहीं उड़ाएंगे? अंत में उसने निश्चय कर ही लिया वह अपने विचारों को बता कर ही रहेगी। किसी और की कहानी लिखने की बजाए अपनी ही कहानी लिखेगी ।कलम चल पड़ी थी सभी तरफ फैली अराजकता ,अशांति की ओर संकेत करती, उनके कारणों को उजागर करती, साथ ही एक सच्चाई को दर्शाती। एक ऐसी सच्चाई जिसे हम बरसों से दफन करते आ रहे हैं उस पर परत दर परत धूल का ढेर बढ़ा रहे है अगर अभी भी नहीं समझे तो शायद सब कुछ उसी धूल में दफन हो जाएगा ,अंधेरे में विलीन हो जाएगा।


 इस सच का अनुभव उसे भी लॉकडाउन के दरमियान हुआ था ।मन की परतें उघड़ने लगी थी ।इस आधुनिक युग में हम सभी की चाहत ने, स्टेटस ने ,एक दूसरे से आगे बढ़ने की होड़, दिखावे ने हमें एक मशीन बना दिया है जिसमें जज्बात नाम का कोई शब्द ही नहीं है। अपनत्व ,प्यार, इंसानियत का नामोनिशान नहीं है ।केवल वक्त के साथ अपने जीत की दौड़ लगानी है चाहे वह कैसे भी हासिल हो साम ,दाम, दंड भेद।


 आम परिवारों की तरह मेरी भी दो बेटियां हैं ।पति के अपने शौक है ।हर वक्त व्यापार की बातें करना, पैसो का घमंड दिखाना, कॉकटेल पार्टियां ,ताश की बाजियों में मसरूफ रहना फिर देर रात घर लौटना। बच्चों को खुली छूट और पैसे देकर उन्होंने अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली थी। मेरी अपनी नौकरी थी ।घर में नौकरों की फौज लोगों की निगाह में ऐशोआराम की जिंदगी दर्शाती थी पर मुझे ना दिन का सुकून था ना रात की चैन ।

बड़ी बेटी काम्या दिन प्रतिदिन जिद्दी उदंडी बनती जा रही थी और छोटी किया जो जन्म से बोल सुन नहीं सकती थी अपने आपको अपमानित महसूस करते ही कंप कंपा जाती या चीख उठती। उसकी तरफ मैं ज्यादा ध्यान देती तो इनके कोप का भाजन बनती "इसको लेकर तुम कहीं चली क्यों नहीं जाती "?

दोनों बच्चों को संस्कारित करने में मुझे कितनी जद्दोजहद करनी पड़ रही है इस बात को समझना तो दूर ,कार्तिक की निगाह में मैं हंसी का पात्र थी ।।मेरी मानसिक अशांति, एक पलड़े में झूलती असहाय जिंदगी उन्हें कभी नजर ही नहीं आई ।

वक्त का पहिया घूमता रहा। महामारी से बचने के लिए जब लॉकडाउन घोषित हुआ सुनकर मुझे राहत मिली और खुशी भी हुई। सोचा अब सभी आराम से वक्त बिताएंगे समय का बंधन नहीं होगा हमारे बीच की कुछ गुत्थियाँ भी सुलझ जाएंगी। पर मैं भूल गई थी पैसा हमारे आंखों पर ऐसी पट्टी बांध देता है जिसमें समझौते की कही गुंजाइश ही नहीं होती।


 एक तरफ दिनभर लैपटॉप पर काम करते करते आंखें थक जाती पैर जकड़ने लगते थे तो दूसरी तरफ घर की पूरी जिम्मेदारियां। इंसानी फितरत जिद के चलते इन्होंने कभी सहायता के लिए अपना हाथ नहीं बढ़ाया और ना ही बच्चों को करने दिया ।सुबह तड़के उठकर देर रात तक जाग जाग कर काम को संभालने की, सभी को खुश रखने की हर मुमकिन कोशिश नाकामयाब रही ।

एक हफ्ते में ही घर मुर्गी का दड़बा बन गया था। शोर शराबा ,उठापटक चीजों का बिखराव मेरी रोक टोक का मजाक " पापा मम्मी का कभी नहाने का राग ,कभी कचरे का, मत फैलाओ कपड़े इधर-उधर, खाने के बर्तन सिंक में रखो" काम्या बुरा सा मुंह बनाकर नकल करती और सभी खिलखिलाते तालियां बजाते। हद यहां तक कि बच्चों से उनके खुद काम करवाने के लिए मुझे पैसों का प्रलोभन देना पड़ता था!

शिकायत के एक लफ्ज़ पर कार्तिक की पूरी पोटली खुल जाती "अभी तक तुम करती ही क्या थी बच्चे भी बाहर का खाना पसंद करते। घर का काम भी सब नौकर चाकर करते थे कुछ दिन थोड़ा सा काम क्या किया ,शुरू हो गया शिकायतों का सिलसिला? तुम्हारी इन्हीं हरकतों से इतना पैसा घर में बहाते हुए भी इस उबाऊ चेहरे को देखने की अपेक्षा मुझे बाहर रहना पसंद आता था पर अब पता नहीं कब तक तुम मां बेटी का चेहरा झेलना पड़ेगा? उनकी पोटली में मेरे लिए एक विशेष मंत्र जरूर रहता "इस दो टके की नौकरी से घर नहीं चलने वाला छोड़ दो " 

 अपमान और तिरस्कार से मैं तिलमिला उठी उस समय पलंग का दस इंच का गद्दा भी मुझे शूल की भांति चुभने लगा बाहर ठंडक होते हुए भी अंदर आग सुलगने लगी मन में अनेकों सवाल उठे क्या मैं नौकरी पैसे कमाने के लिए कर रही हूं ?एक पत्नी प्यार में सब करती चली जाती क्या पति को प्यार नहीं होता क्यों उसे अठारह घंटे की ड्यूटी बिना सम्मान ,वेतन ,प्यार के थमा दी जाती क्या उसकी कोई अहमियत ही नहीं आखिर इस तरह कब तक मैं दोहरी जिंदगी जी पाऊंगी? पर जवाब नदारद 

 आखिर हार थक कर अपने सम्मान अपनी इच्छाओं को ताक पर रखकर मैंने दूसरी जंग लड़ने की ठान ली ।पहली जंग बचपन में अपने पैर पर खड़े होने के लिए मां के बिगड़े हालात को देखते हुए लड़ी थी।अब दूसरी जंग लड़नी है अपने सम्मान पाने की ।पहली कुर्बानी भी मैं ही दूंगी 


मैंने नौकरी छोड़ दी हालात को संभालने की कोशिश में अपनी आत्मा को छलनी करती रही ।यह लिखने में जितना सरल लग रहा है निभाने में सफर उतना ही कठिन था। बीच बीच में टीस उठती मैं ही अपनी इच्छाओं की ,अपनी सोच का दमन क्यों करूं क्यों झुकू ?पर अब पीछे नहीं हटना था!


 सबसे बड़ी चिंता थी किया की ।वह गुमसुम रहती थी या फिर उग्र हो जाती थी उसकी भाषा समझना, समझाना थोड़ा मुश्किल था पर नामुमकिन नहीं ।मैंने वह भाषा सीखी और ज्यादा से ज्यादा समय उसके साथ बिताने की कोशिश करने लगी।


 घर में बस एक ही शर्त लागू कर दी थी सुबह का नाश्ता खाना सभी एक साथ करेंगे ,बाद में नहीं मिलेगा ।शुरू शुरू में कुछ समस्याओं का सामना करना पड़ा पर धीरे-धीरे परिस्थितियों में बदलाव आने लगा ।इसका सबसे बड़ा कारण था ना बाहर का खाना ,ना डॉक्टर का बिल ,ना पिकनिक सिनेमा, दूसरों के साथ दिखावे के सारे रास्ते बंद हो गए थे तो बचत भी थी।

 हर इंसान परिवार चाहता है पर पैसे का दिखावा, अहम उसको गलत रास्ते पर ले जाता है यही इनके साथ हुआ था ।

सुबह से शाम तक आखिर समय भी तो निकालना है तब बातचीत का दौर शुरू हुआ ।धीरे-धीरे सभी कैरम लूडो ताश खेलने के लालच में काम जल्दी समाप्त कर लेते ।अब काम मे सभी की सहभागिता और अपनत्व की भावनाओं ने महसूस किया वक्त पंख लगा कर उड़ रहा है ।


जीवन के इतने सालों बाद मैं पहली बार बारिश में भीग रही थी। उसका आनंद लेते हुए ऐसा लग रहा था वर्षा की रिमझिम फुहारों ने वसुधा के साथ-साथ मेरे अंतर्मन को भी तृप्त कर दिया ,आत्म विभोर कर दिया हो। कार्तिक का स्पर्श पाते ही मेरे ओठ फड़फड़ा उठे ""इन ढाई महीनों में मैंने जीवन की सबसे बड़ी पूंजी अर्जित की ।मन के सुकून की ,परिवार का प्यार और अपने लिए सम्मान की ""कार्तिक बीच में ही कह उठे " वाकई हम भूल जाते हैं कि जीवन निर्वाह के लिए थोड़ी जरूरतें है ,पर यह पैसा जो उन जरूरतों की आधारशिला है हमें बरगला देता है। इंसानी फितरत को उसकी सोच को बद से बदतर बना देता है"'


 कार्तिक भावुक हो गए थे क्षमा प्रार्थी होते हुए कहने लगे "मेरा यह अनुभव ,संदेश मैं सभी के साथ शेयर करना चाहता हूं। पैसे की सुनहरी चाहत ने ईश्वर की सबसे सुंदर रचना मानव को स्वर्ग के द्वार खुलवाने के बजाय नरक का रास्ता बता दिया ।अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है हम चाहे तो वापस वहीं जा सकते हैं बस अपने अहम को पैसे के लोभ को त्यागना पड़ेगा।देखो फलों से लदा वृक्ष ही झुकता है और यह उसकी महानता प्रकृति हमें सिखाती है पर हम ही अपने अहम के आगे कुछ समझना ही नहीं चाहते ।जो हमारी भावनाओं को संस्कारों को दफन कर रहा है!"


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