असली मदद- लघुकथा
असली मदद- लघुकथा
"माँ, आज मेरे सभी क्रिसमस ट्री हाथों-हाथ बिक गए और साथ ही सबने शाबाशी दी वो अलग।"
-खुशी से चहकते प्रतीक ने अपनी माँ शान्ता के हाथों में पैसे थमाते हुए कहा।
"बहुत बढ़िया प्रतीक, तुमने काम ही ऐसा किया है, कि वाह-वाही तो मिलनी ही थी।" शान्ता ने कहा।
"लेकिन माँ बस एक बात का दु:ख है, सोहम का एक भी क्रिसमस ट्री आज नहीं बिका, जबकि उसने तो क्रिसमस ट्री पर मुझसे भी अधिक सुंदर सजावट की थी। आज वह उदासी को पहनकर, मुझसे मिले बिना ही घर चला गया। माँ, क्या हम उसकी कुछ मदद कर सकते हैं?" प्रतीक ने पूछा।
"जरूर प्रतीक इस बार हम सौ नहीं वरन दो सौ क्रिसमस ट्री के पौधे खरीदकर उसे भी इसमें से देंगे ताकि, वह कृत्रिम पेड़ न बेंचे और अभी से पौधों का रखरखाव कर अगले पच्चीस दिसंबर के लिए बड़े पौधे बनाकर, बाजार में बेचकर, पर्यावरण में ऑक्सीजन का स्तर बढ़ाने में अपना सहयोग दे सके।" शांता ने कहा।
"बहुत बढ़िया! माँ, आपने उसकी सबसे अच्छी मदद की है। वह बहुत स्वाभिमानी हैं, हम उसकी पैसे देकर मदद करते तो वह कभी नहीं लेता लेकिन, पौधे वह जरूर ले लेगा।" प्रतीक ने बताया।
