अबु-हसन और गिलहरीयाँ
अबु-हसन और गिलहरीयाँ
अबु-हसन, मुगल बादशाह जहाँगीर के दरबार में एक मुलाजिम था। उसके अब्बा उसे अपने साथ अफगानिस्तान से मुगलिया सल्तनत में काम की तलाश में लाये थे। अबु-हसन तब एक छोटा बच्चा था। वह दिन भर बगीचे में खेला करता था। वहाँ अनेक प्रकार के पेड पौधे थे। चिनार के वृक्षों से आच्छादित बाग अनेक पक्षीयों की आरामगाह थी। पक्षी उन पर अपने घोंसले बनाया करते थे। चुँकी ये पेड कश्मीर में बहुतायात में पाये जाते है, अतः ये मुगलों के बगीचों की भी शान बढाने लगे।
अबु-हसन जब युवावस्था में पहुँचा तो उसे इन्हीं पेडों और उन पर रहने वाले पशु-पक्षीयों से बहुत लगाव बढने लगा। वह अक्सर बगीचे में अपना समय काटने आया करता। ठंड के दिन समीप आ रहे थे। बगीचे में इस साल अखरोट की भरमार थी। अबु ने देखा कुछ गिलहरीयाँ, एक-एक अखरोट मुँह में उठा कर पेड पर चढ रही है। वापस नीचे उतरते समय अखरोट नदारद हो जाते थे। उसने अखरोट को लाने ले जाने की पुरी घटना की छान-बीन करने की ठानी। वह अपनी धोती पिछे खोंच कर उन गिलहरीयों का पिछा करते हुए पेड पर चढने लगा। नन्हीं गिलहरीयाँ इस आगंतुक के अपने समीप आने के कारण शोर मचाने लगी। किंतु आज अबु ने अखरोट के गायब होने की गुत्थी को सुलझाने का फैसला कर लिया था।
गिलहरीयाँ की चीख पुकार को नजरांदाज करते हुए वह आहिस्ता-आहिस्ता पेड पर चढने लगा। काफी ऊपर चढने के बाद उसने पेड में कुछ खोल देखे, जो की छोटे-छोटे गड्डे थे। उनके अंदर अखरोट को जमा किया जा रहा था। माँ गिलहरीयाँ जब अखरोट को अपने मुँह में लाकर उन गड्डों के पास आती तो अंदर से कुछ बच्चे उन्हें अपने कब्जे में ले लेते थे और शोर मचाते हुए भीतर सुरक्षित स्थान पर ले जाकर रख देते। अबु-हसन उनकी कर्तव्यनिष्ठा को देख कर काफी प्रभावित हुआ। वह नीचे उतर गया और कमर से बंधे अपने अंगोछे में बहुत सारे अखरोट ले जाकर पेड की डाली पर बाँध आया। उसे लगा के वह इस प्रकार उनकी कुछ तो मदद कर रहा है।
नीचे रूक कर वह कुछ देर उनकी राह देखता रहा कि शायद गिलहरीयाँ अब बिना किसी मेहनत मशक्कत के आराम से अखरोट अपने खोल के समीप ही पा जायेंगे। किंतु ये उसका भ्रम निकला। गिलहरीयाँ डर के मारे उस झोले के करीब भी नहीं जा रही थी। शायद वे इसे पकडने का कोई जाल समझ रही थी। अबु-हसन वहाँ से चला गया। अगले दिन वह फिर से उस पेड पर पहुँचा, ये देखने के लिये कि क्या गिलहरीयों ने उसके द्वारा दिये अखरोट ग्रहण किये या नहीं? तो उसे अपने द्वारा दिये अखरोट जैसे के तैसे रखे मिले। नीचे खडे उसके पिता ने अबु से कहा, “कुछ समझ में आया?”
“ये पक्षी भी अपनी मेहनत की खाते है। इंसानो की तरह नहीं, जो निरपराधों को लूट-खसोट कर अपना खजाना भरते है।“ अबु-हसन के पिता ने कहा।
दूर खडे बादशाह जहाँगीर ने जब ये बात सुनी तो वे नीचे सिर डाल कर, कुछ सोचने पर मजबुर हो गये।
