वो एक नारी
वो एक नारी
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वो एक नारी
जो अपने घर अंगना को
एक तरतीब से
संवारती है,
हर मुश्किल से
हर तूफान से
बचाती है
खुद की बिना
परवाह किये,
अपने चैन सुकून को
कर दरकिनार
बस बहती चली जाती है।
वो एक नारी
शबरी से सीख ले
खान पान पहल खुद
चख लेती है,
मन से सभी को
परोसती है
शेष न रहने पर
झूठ पेट भरने का
नाटक ही कर
खुद भूखी सो
जाती है।
वो एक नारी
पाई पाई पैसा
बचाकर
सबको मांग पूर्ण
कर देती है,
चादर अपनी
कर संकुड़ी वो
घर अपना चलाती है।
वो एक नारी
दुख भले हो
मन में बहुत पर
चेहरे पर कभी नहीं लाती है,
काल्पनिक मुस्कान दिखाकर
पथ पर अपने
बढ़ती चली जाती है।
