वह तोता
वह तोता
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वह तोता रोज़ सुबह मुँडेर पर आता
दाना पानी चुगता
उड़ जाता
मॉं जब नाम पुकारती
वह भी पुकारता
प्रातः मेरी निगाहें
पहले उसे ही ढूँढती
जब तक अपना नाम न सुनती
मैं भी आँगन में जा
धीरे से खाने का कुछ रखती
डाल से उतर
वह आँगन में फुदकता
चोंच से अपनी कुछ न कुछ कुतरता
मैं दिन भर के हाल बड़बड़ातीं
वह प्यार से मेरी तरफ़ देखता
ऐसी दोस्ती थी हमारी
निःस्वार्थ यह चलता रहा
एक दिन अचानक
पापा की बदली हो गई
मैं और मेरा प्यारा तोता
अब सिर्फ़ यादें ही रह गई हैं ॥
