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Divyanshu Mishra

Others

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Divyanshu Mishra

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वेतन

वेतन

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नया महीना हर बार नई ऊर्जा लाता है
इसी ऊर्जा से कर्ज़दार ईएमआई का बोझ उठाता है
नई तारीख़ बैंक खाते को पल भर की ख़ुशियाँ देती है
चाहे कम हो या अधिक, सबकी जेब गर्म होती है

वेतन का संदेश देखकर,
निगाहें ज्यों ही हटती हैं।

कुछ ही क्षणों में ट्रिंग-ट्रिंग,
फिर दो ईएमआई कटती हैं।

एक ‘गृह-ऋण’ की भेंट चढ़ी,
जिसने दी छत को पहचान,
एक ‘वाहन-किस्त’ ले डूबी,
दिखावे का झूठा सम्मान।

फिर शेष रह जाती है कुछ साँसों की गणना,
जिनमें सपनों से अधिक दायित्व बसते हैं
बिजली, जल, शिक्षा और राशन,
सब पहले याद आते हैं, स्वयं बाद में बसते हैं

मुस्कान जो वेतन संग आई थी,
वह तारीख़ों के साथ मौन हो जाती है
पर पुरुष थक कर भी हारता नहीं,
क्योंकि घर की नींव उसी से बची रह जाती है


वो जानता है कि अगला महीना फिर दस्तक देगा,

वही ऊर्जा, वही संघर्ष, फिर से जन्म लेगा।

कर्ज और सीमित साधनों के बीच वो अटल खड़ा है,

क्योंकि वो 'सिर्फ' पुरुष नहीं, अपने परिवार का आधार बड़ा है।


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