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Krishna Sinha

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Krishna Sinha

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सुनो शिव

सुनो शिव

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सुनो शिव

मै अंश तुम्हारा,

शक्ति तुम्हारी...

मान हूँ तुम्हारा....

मै वही पार्वती

जो तुम्हे पाने के खातिर..

करती रही कई युगो तपस्या...

बनकर सती जो कर गयी एक दिन

स्वयं को अग्नि ज्वाला में आहूत...

जो स्वयं पिता को कर सकी क्षमा ना

अपमान से तुम्हारे थी जो इतनी आहत...

सुनो शिव

मै वही अंश तुम्हारा।

माना रौद्र रूप

तुम धरते हो,

हो अन्याय तांडव रचते हो...

पर नियंत्रित है क्रोध तुम्हारा...

कर संहार तुम धीर धरते हो...

बस यही कला ना मुझमे आयी...

जब जब मै क्रोधित हो आयी..

बनी मै काली, फिर थम ना पायी...

रोकना तुम्हे ही होता फिर मुझको...

तुम लेटे जमीं पर, धर पैर तुम पर मै पछताई....

सुनो शिव

मै वही अंश तुम्हारा।



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