सुनो चिरैया !
सुनो चिरैया !
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सुनो चिरैया,
काश !
तुम देख पाओ
अपनी चिप-चिप नन्हीं आंखों से,
इस जर्द हुए जाते
दिल के
मौन अंधियारे कोनों को,
पंखों की फर-फर में
अहसास कर पाओ
इसका अनहदनाद,
महसूस कर पाओ
मन-गूंज की पदचाप,
सुन पाओ
आसमां में तरंगित
मेरा निमंत्रण,
अर्थ समझ पाओ
उलझे मन के सुलझे सवाल,
स्वीकार पाओ
मेरा होना,
तो शायद
भटकती रूह को
मुकाम मिल जाए,
और तुम भी लौट सको
अपने घोंसले में ।
