सुनहरे दिन
सुनहरे दिन
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निस्वार्थ प्रेम के सुनहरे दिन
सब कुछ शून्य है प्रेम के बिन
आओ भरपूर जी लें बचपन के
सुनहरे दिन फिर लौट के ना आएंगे
बचपन के दिन .....
ऊँचे-ऊँचे सपनों के
महलों में और चाँद पर
परियों के लोक जाने के प्यारे दिन
फिर कहीं बड़े होंगे तब.....
प्रतिस्पर्धा की दौड़ में
भीड़ में कहीं खो जायेंगे
जवानी बीत जाएगी
जब बूढ़े हो जायेंगे
तब ये पल बहुत याद आयेंगे
बचपन के सुनहरे दिन
जी लो और जीने दो
बचपन की मासूमियत में
छिपे परमात्मा एक दिन
बचपन यानि निस्वार्थ
प्रेम के सुनहरे दिन
