सुख-दुख
सुख-दुख
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चलो आज कहीं चलते है
जिधर गम ना हो वहाँ निकलते है
टूट गया संग जिन्दगी में अपनो का
चलो उनके दिलों में अपनी जगह जगह बनाते है
बहुत समय बीता भटके हुए अँधेरों में
चलो इस अँधेरों की रोशनी तलाश करते है
निकल गई बहुत दूर अकेली मैं
चलो इस सफर में सुख की खोज करते है
सुख दुख है जीवन के दो आधार
एक के बिना दूजा है बेकार
सुख के बाद दुख
दुख के बाद सुख
का चक्र चलता रहता है
फिर क्यूँ इंसान सुख को चाहता है
और दुख से भागता रहता है।
