सपने
सपने
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सपने करीब कुछ तो, आएं है मगर
नींदें है कि अब तो, आती ही नहीं।
अपनों के पास सारी, खुशियां है मगर
खुशियों में मेरे अब वो, अपने हीं नहीं।
देखूं तो संग मेरे, सैकड़ों हैं मगर
सैकड़ों में भी कोई संगी, दिखता ही नहीं।
कई रात चलकर, पहुंचा हूं इस डगर
की अब चाहकर भी, लौट पाऊंगा नहीं।
