सोनू की किस्मत
सोनू की किस्मत
बड़ी प्यारी सी सोनू नाम की एक छोरी,
रोज़ घर से निकलती थामे टाट की बोरी।
सांवली रंगत बिखरे माथे पर भूरे से बाल,
कचरा बीने फिरती स्थिति उसकी फटेहाल।
जब भी देखती कोई बांग्ला आलिशान,
चमकती मोटरगाड़ी खींचती उसका ध्यान।
जब देखती परियों सी लड़की बेमिसाल,
खड़े-खड़े आने लगते उसको भी ख़याल।
खुद को भी स्वप्न में परियों सा देखकर,
खुश हो लेती स्वप्निल दुनिया को जीकर।
एक दिन वक़्त था उस पर मेहरबान,
कचरे कुरेदती लगाए वो बड़ा ध्यान।
अचानक उसके एक चिराग हाथ आया,
जो उसके नन्हे से दिल को बहुत भाया।
बड़े जोश में सरपट भागी वो बच्ची नादान,
चिराग की हकीकत से शायद थी अनजान।
घर पहुंचकर जो धूल वो हटाने लगी,
धुएँ मैं प्रकट हुआ एक जिन्न बलवान।
सोनू रोने लगी डर से दिल घबराने लगा,
जिन्न हँसता हुआ ,उसको रिझाने लगा।
सोनू डरते डरते बोली,आप कौन है काका?
जिन्न बोला मैं गुलाम,"क्या हुकुम है मेरे आका"
सोनू को पल भर समझते भी देर न लगी,
शायद बरसों से सोई किस्मत आज जगी।
खुश होकर सोनू ने अपनी इच्छा बताई,
पेट भर खाने को मांगे फल मेवा मिठाई।
ये सुनकर जिन्न को दया भी आ गयी,
उसकी मासूमियत जिन्न को भा गयी।
धीरे धीरे सोनू की ख्वाहिशें पूछकर,
पूरा करता गया जिन्न खुश होकर।
सोनू की गुलामी आखिर जिन्न को भी फली,
चिराग की बंदिशों से जिन्न क़ो मुक्ति जो मिली।
