STORYMIRROR

Sonu Raj

Others

3  

Sonu Raj

Others

संक्रांति बनाम क्रांति

संक्रांति बनाम क्रांति

1 min
297

थी उल्लासी लोगो में क्योंकि पर्व था संक्रांति का

किंतु ऐसा लग रहा था मानो पर्व है क्रांति का

थी रौनक हर दुकान में

थी मुस्कान हर मकान में


उबल रहा था देश का एक कोना

क्योंकि वहां संक्रांति नहीं क्रांति था

थी निराशा हर मकान में

थी अंधियारे हर गलियारे में


एक कौम से लबालब थी सड़क

चूंकि खरीदारी की थी महक

थी खुशियाँ हरेक के लालटो पे

चमक रहे थे चंदन हर एक के माथे पे


दुसरे कौम से थरथरा सी गई सड़क

क्योंकि आंधी थी क्रांति की

थे दहशत में लोग आधे

चारो ओर हो रहे थे आगजनी व नारे


Rate this content
Log in