सिसकते रिश्ते
सिसकते रिश्ते
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जब से रुपया पैसा जीवन का आधार बने हैं
मेरे देश में भी परिवार टूटने लगे हैं।
टूट रहा जड़ों का रिश्ता मिट्टी से
बंजर जमीं, पेड़ ठूंठ लगने लगे हैं।
मन की भूख बड़ी, कम पड़ने लगे दाने
छोड़ घोंसला अपना, पंछी उड़ने लगे हैं।
सांझे चूल्हे पर पकता था प्यार जहाँ
घर बंटे, चूल्हे बंटे, मन भी बंटने लगे हैं।
होली दिवाली आकर मिल जाया करते थे
बढ़ गया व्यापार अब वीडियो कॉल करने लगे हैं।
समय नहीं अपने परिवार के लिए 'सचिन'
नया ट्रेंड है फेसबुक पर परिवार बनने लगे हैं।
