शून्य में विलीन स्वर
शून्य में विलीन स्वर
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जब थकी हुई साँसें मौन हो जाएँ,
स्वप्नों की मधुर धुन भी थम जाए।
ना प्रभात हो, ना रजनी बचे,
केवल नीरवता सब ओर छा जाए।
मृत्यु तब आए ना विदा बनकर,
ना भय बनकर, ना पीड़ा लेकर।
वह आए एक कोमल गीत बनकर,
जीवन के सुरों में बंधकर।
जब तन निस्पंद हो, प्राण गाए,
थकन भी प्रेम की गोद में समाए।
तब अंतिम वेला में हो यह स्वीकार,
एक गीत, एक वचन, एक अन्तिम प्यार।
