सबकी मदद, कोई नहीं हमदर्द।
सबकी मदद, कोई नहीं हमदर्द।
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तुम कुदरत की ऐसी उत्पति,
जो किसी से कुछ नहीं मांगती,
खुद ही अपनी परवरिश करती,
विशाल रूप धारण कर लेती,
फिर सबको पालती,
नहीं कभी मना करती,
बस देना ही जानती,
मृत्यु प्राप्त करने के बाद भी,
हजारों काम आती,
पेड़ नाम से जानी जाती।
शायद इंसान को निस्वार्थ सेवा का पाठ,
तुमने ही पढ़ाया होगा,
आखिर तक काम आओ,
तुमने ही सिखाया होगा,
तुम अपना योगदान देते जाते,
और हम इंसान बस अपना काम निकालना जानते।
