रफ कॉपी
रफ कॉपी
अपने परिवार को संभालते हुए माँ की हालत रफ कॉपी सी हो गई है ,
जिस प्रकार उस रफ कॉपी में सभी के सभी विषय समाहित होते हैं न ,
उसी तरह माँ के जीवन की स्तिथि भी उसी कॉपी के समान हो गई है ,
जिसमें जिम्मेदारियाँ ,मजबूरियाँ कभी हँसना कभी रोना सब समाया है ,
पता है ये रफ- कॉपी हम सबके जीवन में बहुत ही महत्वपूर्ण होती है ,
इसके बिना तो जीवन अपना हम सभी को अधूरा–अधूरा सा ही लगता है ,
जब भी कुछ अच्छा करने का मन हो तो पहले रफ पर ही लिख लेते हैं ,
और जब कभी गलतियों से बचना हो हमें तो रफ कॉपी पर सुधार लेते हैं I
इसी प्रकार परिवार की ढाल बनकर वो गलतियों से सबको बचाती है ,
हमारी बुराइयों को सुधारकर हमें अच्छाइयों की राह पर ले जाती है ,
मुख से कुछ न कहती अच्छा हो या बुरा हो सब चुपचाप सह लेती है ,
सारे घर की जिम्मेदारियों को संभालने का भार इनके सर पर होता है ,
अपनी सफलता का श्रेय हम अपनी फेयर कॉपी को जाने क्यों दे देते है ,
असल में फेयर कॉपी पर लिखे अक्षर पहले रफ कॉपी में सजे होते हैं ,
देखा जाए तो फेयर कॉपी करने के लिए रफ कॉपी को संभाला जाता है ,
परीक्षा में भी पढ़ने के लिए अक्सर रफ कॉपी को ही पहले खंगाला जाता है ,
माँ जिसके अन्दर न जाने कितनी ही असीमित भावनाओं का भंडार है ,
हर सुख –दुःख ,हार –जीत ,अच्छा –बुरा सब में साथ हमारे होती है ,
जब हँसते तो वो भी हँसती है हम रोते तो वो भी हम संग रोती है ,
इसलिए हर मोड़, हर पड़ाव पर हमें इस रफ कॉपी की जरुरत होती है I
