रहा है वो
रहा है वो
1 min
205
मेरी ज़िन्दगी में हर दिन गहरा रहा है वो
कैसे मैं भूल जाऊं कभी मेरा रहा है वो
वो जो मेरी लकीर में कुछ था नसीब सा
मेरी हथेलियों से घबरा रहा है वो
शायद खुदा ने भी है लिया दिल से फैसला
हाथों को सर पे रख कर पछता रहा है वो
सुनते हैं उसने भी है करी खुद से बेरुखी
मेरी ही दास्ताँ को दोहरा रहा है वो
सुनते हैं अक्स बोलता है ख्वाहिशें सभी
जाने क्या आईने को समझा रहा है वो
साया भी मुझसे रूठ गया जान कर मुझे
मेरे बदन से अब तो कतरा रहा है वो
राहों में दूर दूर तलक कोई भी नहीं
फिर क्यूँ कदम कदम पर टकरा रहा है वो।
