प्यासी धरती पर बारिश की
प्यासी धरती पर बारिश की
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प्यासी धरती पर बारिश की कुछ बूंदें बरसीं जो
और बढ़ गई तपन भाप से जलने लगा है तन मन
सोंधी सी खुशबू की कतरन तैर गई हवा में
पर प्यासी ही रही धरा और प्यासे हैं वन उपवन
हे मेघ दूत घनघोर घटा बरसाओ
हरियाली से भर जाओ
धरती के फैले आंचल को
और जरा फैलाओ
ममता की रस धार स्नेह के स्रोत
कहीं न सूखें
सब जल जाए इससे पहले
अमृतधार बरसाओ
खिले धारा खिल जाए कण कण
धुले धरा धुल जाए गगन
मिट्टी की सोंधी खुशबू से
भर भर जाए हर मन
