पुष्प और तितली
पुष्प और तितली
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तितली और पुष्प का प्यार
है नदिया और सागर जैसा
पुष्प नहीं जाता तितली के पास
तितली आती उसके पास।
पुष्प का सुंदर रूप लुभाता
उसकी खुशबू उसे बुलाती
तितली वशीभूत होकर
डोलती पहुँच जाती पुष्प पर।
ना कभी पुष्प ने मना किया
जितना चाहत दिल से रस पिया
फिर मदमस्त हो उड़ जाती ।
बस अंतर केवल एक ही
नदियां जाकर समा जाती सागर में
पर तितली मधु लेकर उड़ जाती ।
उसका प्यार है कुछ पल का
बस अपना काम साधा और उड़ चले
पर नदिया जीवन समर्पण का
सागर का सहारा पाकर
समा जाती सागर में ।
प्यार न साजे एक तरफा
दोनों में हो तो सिर चढ़ बोले।
