पथ-प्रकाशक
पथ-प्रकाशक
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अज्ञानता तम नाश कर,
ज्योति जागते ज्ञान की।
गुरूओं के आशीर्वाद में,
होती कृपा भगवान की।
मिट्टी को साँचे ढाल कर,
उपकार ही करते सदा।
कर दान विद्या का हमें,
सद्ज्ञान ही भरते सदा।
बिन गुरु कृपा संसार में,
भटके मनुज पशुतुल्य ही।
गुरु चरण धूलि माथ रख,
हो ज्ञात जीवन मूल्य भी।
कर जोड़ करते वंदना,
आशीष नित मिलता रहे।
हे ! पथ-प्रकाशक,दीप फिर,
शुभ ज्ञान का जलता रहे।
